गणपति पूजन के खास नियम
गणेश जी की पूजा-अर्चना मध्याह्न में विशेष फलदायी है।
गणेश चतुर्थी को गणेश जी की पूजा में कभी भी नहीं लगता है भद्रा दोष।
भद्रा में गणेश जी की पूजा करना होता है अधिक श्रेयस्कर।
सायंकाल चतुर्थी का चन्द्रमा देखने से लगता है कलंक।
चतुर्थी में चन्द्रोदय हो और रात में जब भी पंचमी आ जाए तो चन्द्र दर्शन का नहीं लगता हो दोष।
मध्याह्न में चतुर्थी हो और सायंकाल चन्द्रोदय पंचमी में हो तो भी नहीं लगता है चन्द्र दर्शन का दोष।
सिंह संक्रांति के सूर्य में ही लगता है चतुर्थी के चन्द्र दर्शन का दोष, कन्या राशि की संक्रांति की चतुर्थी में नहीं लगता है कोई दोष।
सुखदा-शुभदा और कल्याणकारी "शिवा" महागणपति चतुर्थी महोत्सव पर अविघ्नस्वरूप निर्विघ्नकर्ता गणेश जी महाराज के जन्मोत्सव की बहुत बहुत सहृदयी मंगलकामनाएं।
नमामि नन्दनन्दनं समस्त विघ्नभञ्जनम्
भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी गणेश चतुर्थी महोत्सव के नाम से प्रसिद्ध है। इस दिन गणेश जी की प्रसन्नता के लिए वरद चतुर्थी, विनायक चतुर्थी, सिद्धि विनायक चतुर्थी, कपर्दी विनायक चतुर्थी, उच्छिष्ट गणपति चतुर्थी, शिवा चतुर्थी, सौभाग्य चतुर्थी, कलंक चतुर्थी, पार्थिव गणपति चतुर्थी, दुर्वा गणपति आदि व्रत भी कहे हैं।
गणेश चतुर्थी के दिन किसी भी स्थिति में भद्रा का दोष नहीं लगता है, प्रतिवर्ष मध्याह्न काल में ही गणेश पूजा का विधान है। आजकल शुभ चौघडियों में व शुभ लग्नों में भी गणेश जी का पूजन होने लगा है।
गणेश चतुर्थी व्रत में मध्याह्न व्यापिनी चतुर्थी ग्राह्य है।-
गणेश चतुर्थी मध्याह्न व्यापिनी ग्राह्या।
कतिपय विद्वज्जन प्रदोषकाल व्यापिनी चतुर्थी भी ग्रहण करते हैं।
यदि दो दिन मध्याह्न व्यापिनी चतुर्थी हो तो पहली ग्रहण करें।
दो दिन प्रदोष व्यापिनी हो तो पंचमीयुता दूसरी ग्रहण करें।-
उभयदिने प्रदोषव्याप्तौ पंचमीयुक्ता "युगाग्नि क्रतुभूतानि" इत्यादि निगमात्।
और भी
चतुर्थी पञ्चम्यो: तिथियुग्मप्रतिपादक नियमेन युग्मादर:।
और भी स्पष्ट करते हुए लिखा है कि-
मातृविद्धा प्रशस्ता स्याच्चतुर्थी गणनायके।
मध्याह्ने परतश्चेत् स्यान्नागविद्धा प्रशस्यते।।
गणेश चतुर्थी के दिन मध्याह्न में प्रायः क्षतिज पर वृश्चिक स्थिर लग्न ही रहता है जो सर्वविध मंगलकारी है स्थिरता और शुभता प्रदाता है।
महर्षि हेमाद्रि के "चतुर्वर्गचिन्तामणि" में आदेश है कि इस दिन प्रातः सफेद तिल मिश्रित जल से स्नान करें। नित्य कर्म कर मध्याह्न में गणपति का पूजन करें।
मध्याह्न समय जानने के लिए किसी भी स्थान के दिनमान के पांच भाग कर लें। यहां दो तीन या चार भाग वाले दिन के स्थान पर पांच विभाग दिवस ही ग्राह्य हैं। हमारे यहां स्थूल रूप से प्रत्येक भाग अढ़ाई घंटे से न्यून समान सा रहता है।
दिन के पांच भाग-
1. प्रात:काल
2. संगव काल
3. मध्याह्न काल
4. अपराह्न काल
5. सायाह्न काल
तीन-तीन मुहूर्त अर्थात् छः-छः घटी का एक भाग होता है। मध्याह्न काल के मध्य में निश्चित रूप से अभिजित् मुहूर्त रहता है वह गणपति पूजा में सर्वविध मंगलकारी है।
बुधवार को अभिजित् मुहूर्त त्याज्य रहता है। अतः बुधवार को मध्याह्न के मध्य भाग अभिजित् में गणेश पूजन सहित सभी शुभ कार्यों का निषेध है।
मध्याह्न व्यापिनी चतुर्थी के दिन घर में, प्रतिष्ठान में या मण्डपादि में गणपति पूजा करना श्रेयस्कर है। इसी समय द्वारगणपति की पूजा भी करनी चाहिए। शुभ लग्न एवं शुभ चौघड़ियों में भी आजकल के विद्वान् पूजा करने-कराने लगे हैं।
इस दिन गणेश प्रतिमा की प्राण-प्रतिष्ठा और अन्य शुभ कार्य अबूझ मुहूर्त मानकर कर सकते हैं।
गणेश चतुर्थी के दिन प्राय: भद्रा रहती है। शुक्ल पक्ष की चतुर्थी के उत्तरार्ध में विष्टि करण होने से भद्रा रहेगी ही। परन्तु गणपति पूजा में भद्रा दोष नहीं माना जाता है। अपितु गणेश चतुर्थी को भद्रा में पूजन करना श्रेयस्कर है।
गणेश जी कैसे लें? -
गृहस्थियों के लिए बायीं ओर घूमती सूंड का मुख नीचे से दाहिनी ओर घूमता रहे ऐसी गणेश प्रतिमा विशेष शुभ होती है। अर्थात् दक्षिणावर्तमुखी गणेश जी शुभ होते हैं।
सब पूछते हैं कि घर में कितने गणेश जी हो सकते हैं-
शास्त्रीय मत से एक दो छह आठ या द्वादश गणपति विशेष शुभ कहे गए हैं।
शास्त्रों में शुक्ल पक्ष की चतुर्थी के तीन प्रकार कहे हैं... शुक्ल पक्ष की चतुर्थी- 1. शिवा, 2. शान्ता, 3. सुखा नाम से प्रसिद्ध है।-
शिवा शान्ता शिवा राजन् चतुर्थी त्रिविधा स्मृता।
मासि भाद्रपदे शुक्ला शिवलोके प्रपूजिता:।।
भविष्य पुराण के अनुसार भाद्रपद शुक्ल पक्ष की शिवा, माघ शुक्ल पक्ष की शान्ता और वही चतुर्थी मंगलवार युक्त हो तो "सुखा" नाम से जानी जाती है। भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी "शिवा चतुर्थी" कहलाती है।
अतः गणेश चतुर्थी मंगलवार की हो तो सर्वविध सुख-शांति और कल्याणकारक "शिव" तत्व को देने वाली "शिवा" नामक चतुर्थी शास्त्रों में कही गयी है।-
भौमवारेण सा चेदक्षया सा प्रकीर्तिता।
गणेश चतुर्थी रविवार की भी प्रशस्त है -
भाद्रशुक्ल चतुर्थी वा भौमेनार्केण वा युता।
महति सात्र विघ्नेनमर्चित्वेष्टं लभेन्नर:।।
गणपति पूजा के लिए बुधवार भी अति प्रशस्त है।
कृष्ण पक्ष की चतुर्थी -
प्रत्येक माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी "संकटनाशन चतुर्थी" या "संकष्ट चतुर्थी" कहलाती है। इस चतुर्थी व्रत में गणपति पूजा के रूप में चौथ माता की पूजा अर्चना कर महिलाएं चतुर्थी का व्रत करती है।
शुक्ल पक्ष की चतुर्थी
गणेश चतुर्थी रविवार या मंगलवार युत हो तो महागणपति चतुर्थी कहलाती है। वैसे आजकल किसी भी वार की चतुर्थी हो सबको महागणपति चतुर्थी के नाम से ही प्रचारित किया जाता है।
भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी "शिवा" के दिन ही सिद्धि विनायक व्रत किया जाता है। सौभाग्य चतुर्थी का व्रत किया जाता है। कहा भी है..
भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी शिवाख्या तस्यां सिद्धिविनायक व्रतम्।
इस दिन गणेश जी की विधिवत पूजा करें। लड्डु मिष्ठान्न और दूर्वा चढ़ावें। शास्त्रीय आदेश देखिए....
गणेशमूर्तौ प्राणस्थापनपूर्वकं षोडशोपचारै: सम्पूज्य मोदकनैवेद्यं दत्वा एकविंशतिदुर्वाङ्कुरान् गृहित्वा नामदशकै: प्रत्येकं दुर्वाद्वयं समर्प्य अवशिष्टामेकां दशनामभि: समर्पयेत्। मोदकान् विप्राय दत्वा स्वयं भुञ्जीतेति संक्षेप:।
गणेश चतुर्थी के दिन तो इन दस नामों से गणेश जी की पूजा करनी ही चाहिए, प्रतिदिन भी करें तो ऋद्धि सिद्धि शुभ लाभ सहित गणेश जी की विशेष कृपा बनी रहती है।
गणेश जी के दश नाम...
गणाधिपाय नमः
उमापुत्राय नमः
अघनाशकाय नमः
विनायकाय नमः
ईशपुत्राय नमः
सर्वसिद्धिप्रदायकाय नमः
एकदन्ताय नमः
इभवक्त्राय नमः
मूषकवाहनाय नमः
कुमारगुरवे नमः
21 त्रिशूली दुर्वांकुर लेकर एक-एक नाम बोलते हुए गणेश प्रतिमा पर दो-दो दूर्वा चढ़ाएं और अन्त में इन दसों नामों का उच्चारण कर शेष एक दूर्वा अर्पित करें। ऐसे ही 21 लड्डुओं का भोग लगाकर दस प्रसाद के रूप में वितरित करें, दस स्वयं लें और एक गणेश जी को ही समर्पित कर दें। कई लोग 21 पुए आदि भी चढ़ाते हैं।
गणेश जी के 12, 108 या 1000 नाम मन्त्रों से सहस्रार्चन या इनके मंत्रों का जप/पाठ बहुत ही फलदाई होता है।
इसके साथ गणपति अथर्वशीर्ष से भी विशिष्ट पूजा कर सकते हैं।
गणेश जी को श्वेत और रक्त पुष्प अतिप्रिय हैं।
गणेश जी को सिन्दूर भी अतिप्रिय है इसीलिए सिन्दूर को "गणेशभूषण" भी कहा जाता है।
गणेशजी का बीज मन्त्र "गॅं" है इसके जप से सिद्धि प्राप्त होती है-
पञ्चान्तकं शशिधरं बीजं गणपतेर्व्विदुः।
पञ्चान्तको गकारः - "गँ" है।
और इनका मूल मंत्र "ॐ गॅं गणपतये नमः" है॥
जिस प्रकार शिवके निर्माल्य अर्थात् उच्छिष्ट भोग का अधिकार "चण्ड" को है उसी प्रकार गणेश के निर्माल्य का विशेषाधिकार "वक्रतुण्ड" को है। अन्य देवताओं के निर्माल्य के ही अधिकारी देवता कहें हैं इनके पूजन भी मनोकामनाओं की सम्पूर्ति में सहायक हैं।
गणेश नाम शिव का भी है -
प्रसादये त्वां भगवन्!सर्व्वभूतमहेश्वर।
गणेशं जगतः शम्भुं लोककारणकारणम्॥
मूषक वाहन "गणेश" के नाम की व्याख्या -
गणानां गणाख्य देवविशेषाणां विघ्नाख्यदेवानां वा ईशः नियन्ता इति - शिवपुत्त्र: गणेश:।
महाभारत में कहा है कि किसी भी ग्रन्थ के शुभारम्भ से पूर्व मंगलाचरण के रूप में गणेश जी स्मरण अभय वरद प्रदान करता है -
काव्यस्य लेखनार्थाय गणेशः स्मर्य्यतां मुने।।
स्कन्द पुराण में गणेश जी का स्वरूप...
एकदन्तं शूर्पकर्णं
नागयज्ञोपवीतिनम्।
पाशाङ्कुशधरं देवं
ध्यायेत् सिद्धिविनायकम्।।
गणेश जी के प्रसिद्ध पौराणिक ध्यान-
खर्व्वं स्थूलतनुं गजेन्द्रवदनं लम्बोदरं सुन्दरं प्रस्यन्दन् मदगन्ध लुब्ध मधुप व्यालोल गण्डस्थलम्।
दन्ताघात विदारितारि रुधिरैः सिन्दूर शोभाकरं
वन्दे शैलसुतासुतं गणपतिं सिद्धिप्रदं कामदम्॥
सिन्दूरासिक्त त्रिनेत्रधारी गणेश जी का ध्यान -
सिन्दूराभं त्रिनेत्रं पृथतरजठरं हस्तपद्मैर्दधानं दन्तं पाशाङ्कुशेष्टान्युरुकरविलसत्बीजपूराभिरामम्।
बालेन्दुद्योतमौलिं करिपतिवदनं दानपूरार्द्रगण्डं
भोगीन्द्राबद्धभूषं भजत गणपतिं रक्तवस्त्राङ्गरागम्॥
देवेन्द्र मौलि मन्दार मकरन्द कणारुणाः।
विघ्नं हरन्तु हेरम्ब चरणाम्बुज रेणवः॥
एकपञ्चाशत् -51 गणेश जी और इन की 51 शक्तियों की पूजा विशेष फलदाई कही है-
विघ्नेशो विघ्नराजश्च विनायक शिवोत्तमौ।
विघ्नकृत् विघ्नहर्त्ता च गणैक द्विसुदन्तकाः॥
गजवक्त्र निरञ्जनौ कपर्द्दी दीर्घजिह्वकः।
शङ्ककर्णश्च वृषभ-ध्वजश्च गणनायकः॥
गजेन्द्रः सूर्पकर्णश्च स्यात्त्रिलोचनसंज्ञकः।
लम्बोदर महानन्दौ चतुर्म्मूर्त्तिसदाशिवौ॥
आमोद दुर्म्मुखौ चैव सुमुखश्चप्रमोदकः।
एकपादो द्विजिह्वश्च सुरवीरः सषण्मुखः॥
वरदो वामदेवश्च वक्रतुण्डो द्विरण्डकः।
सेनानी: ग्रामणी: मत्तो विमत्तो मत्तवाहनः॥
जटौ मुण्डी तथा खड्गी वरेण्यो वृषकेतनः।
भक्षप्रियो गणेशश्च मेघनादक संज्ञकः॥
व्यापी गणेश्वरः प्रोक्ताः पञ्चाशद् गणपा इमे।
तरुणारुणसङ्काशा गजवक्त्रास्त्रिलोचनाः।।
पाशाङ्कुशवराभीति हस्ताः शक्ति समन्विताः।।
इन 51 गणेश जी की 51 शक्तियां इनके स्मरण मात्र से ही सिद्धि हस्तगत कर सकते हैं।-
ॐ ह्रीः- श्रीश्च पुष्टिः शान्तिश्च स्वस्तिश्चैव सरस्वती।
स्वाहा मेधा कान्ति कामिन्यो मोहिन्यपि वै नटी॥
पार्व्वती ज्वलिनी नन्दा सुयशाः कामरूपिणी।
उमा तेजोवती सत्या विघ्नेशानी सुरूपिणी॥
कामदा मदजिह्वा च भूतिः स्याद्भौतिकासिता।
रमा च महिषी प्रोक्ता शृङ्गिणी च विकर्णपा॥
भ्रुकुटिः स्यात्तथा लज्जा दीर्घघोणा धनुर्द्धरा।
यामिनी रात्रि संज्ञा च कामान्धा च शशिप्रभा॥
लोलाक्षी चञ्चला दीप्तिः सुभगा दुर्भगा शिवा।
भर्गा च भगिनी चैव भोगिनी सुभगामता॥
कालरात्रिः कालिका च पञ्चाशत् शक्तयः स्मृताः।
सर्व्वालङ्करणोद्दीप्ताः प्रियाङ्कस्थाः सुशोभनाः॥
रक्तोत्पलकरा ध्येया रक्तमाल्याम्बरारुणाः॥
इस दिन मां पार्वती की पूजा स्त्रियों के सौभाग्य की अभिवृद्धि करती है इसलिए स्त्रियां सौभाग्य चतुर्थी का व्रत करती हैं।
कृतिमहार्णव में लिखा है...
भाद्रशुक्ल चतुर्थ्यां तु
पूजयेत् पार्वतीं शुभाम्।
तस्यां वै पूजितायां तु
सौभाग्यं न विहन्यते।।
महाराष्ट्र में तो गणपति महोत्सव 10 दिन अर्थात् अनन्त चतुर्दशी पर्यन्त चलता है।
गणेश चतुर्थी को चन्द्र दर्शन निषेध-
भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी के चन्द्रमा के दर्शन निषेध माने जाते है। इस चतुर्थी तिथि में चन्द्रमा को यदि कोई देख लेता है तो उस वर्ष में उस पर कोई न कोई मिथ्या कलंक अवश्य लगता है।-
अत्र चतुर्थ्यां चन्द्रदर्शने मिथ्याभिदूषणं दोष:।
मार्कण्डेय पुराण में विशेष रूप से कहा है कि सिंह राशि के सूर्य में चतुर्थी तिथि को चन्द्र दर्शन का प्रभाव अशुभ कहा गया है...
सिंहादित्ये शुक्लपक्षे चतुर्थ्यां चन्द्रदर्शनम्।
मिथ्याभिशापं कुरुते तस्मात्पश्येत्न तं तदा।।
पाराशर ऋषि के अनुसार गणेश चतुर्थी के दिन कन्या राशि का सूर्य हो तो चांद देखने का कोई दोष नहीं होता है। सामान्य रूप से 17 सितम्बर के बाद गणेश चतुर्थी आये तो चांद देखने का कोई दोष नहीं लगता है। क्योंकि 17 सितम्बर को भगवान भुवन भास्कर कन्या राशि में प्रवेश कर चुके होते हैं। ..
कन्यादित्ये चतुर्थ्यान्तु शुक्ले चन्द्रस्य दर्शनम्।... शुभम्
रात्रि में चतुर्थी पूर्ण हो जाए और पंचमी तिथि आ जाए तो भी चन्द्र दर्शन का कोई दोष नहीं होता है।-
पञ्चम्यां दर्शने न दोष:
सायंकाल पंचमी के चन्द्रमा देखने का कोई दोष नहीं है। फिर भी चन्द्र दर्शन से बचें। शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को पश्चिम में चन्द्रोदय होता है।
चतुर्थी के चन्द्र दर्शन करने से मिथ्याक्षेप तो भगवान योगीश्वर - योगेश्वर श्री कृष्ण तक को झेलने पड़े थे। उन पर स्यमन्तक मणि चोरी करने का कलंक लगा था।
इसलिए इस दिन सिंह राशि के सूर्य में तो भूलकर भी चन्द्रमा का दर्शन नहीं करें।
हां संयोग से गणेश चतुर्थी कन्या राशि के सूर्य में आ जावे अर्थात् 17 सितम्बर के बाद आये तो किसी भी स्थिति में चन्द्र दर्शन का दोष नहीं लगता है।
गणेश चतुर्थी का चन्द्रोदय सदैव पश्चिम दिशा में होता है। जो कोई असावधानी वश देख भी लें तो स्यमन्तक मणि की कथा अवश्य सुननी चाहिए। जिससे दोष का शमन होता है। और विष्णु पुराण के निम्न मन्त्र का जप पूर्व या उत्तर में मुंह करके करें...
ॐ सिंह: प्रसेनमवधीत् सिंहो जाम्बवता हत:।
सुकुमारक मा रोदी: तव ह्येष: स्यमन्तक:।।
उसके बाद सत रज तम गुणत्रय के निधान श्री गुणेश जी को फल पुष्प अन्न आदि को जल में समर्पित करें या ब्राह्मण को दान दें। शास्त्रों में दही का दान भी कहा है। दानादि कर्म के पश्चात् प्रार्थना करें।...
रूपं देहि यशो देहि भाग्यं भगवन् देहि मे।
पुत्रान् देहि धनं देहि सर्वान् कामान् प्रदेहि मे।।
गणेश जी को गणपति भी कहा है-
गणानां गणसंज्ञकानां देवानां पतिः अधीश्वरः स्वामी वा।
पञ्चतन्त्र में गणेश जी का वर्णन करते हुए लिखा है -
अत्तुं वाञ्छति शाम्भवो गणपतेराखुं क्षुधार्त्तः फणी।
तं च क्रौञ्चरिपोः शिखी गिरिसुता सिंहोऽपि नागाशनम्॥...
गणेश जी महाराज अग्र पूजनीय प्रधान देवता हैं हमारे।
गणपति शिवजी का भी नाम है।यजुर्वेदीय वाजसनेयसंहिता के 16/25-
ॐ नमो गणेभ्यो गणपतिभ्यश्च वो नमो नम इति॥
ऋग्वेदे के 2/23/1 में भी कहा है-
गणानां त्वा गणपतिं हवामहे कविं कवीनामुपमश्रवस्तमम्॥
नवधा भक्ति के -
श्रवणं कीर्त्तनं विष्णो: स्मरणं पादसेवनम्।
अर्चनं वन्दनं दास्यं सख्यमात्मनिवेदनम्।।
के किसी भी भक्तिरूप में भगवान महागणपति से नान्यं जाने नैव जाने न जाने का भाव लेकर प्रार्थना करें।-
हे विघ्नकर्ता विघ्नराज !!
हे विघ्नहर्ता अविघ्नरूप !!
हे सिद्धि दाता !!
हे सिद्धि विनायक !!
हे गजवदन अचिन्त्यरूप !!
हे अखिल लोकनायक !!
हे दुर्मुख विरूप!!
हे विश्वरूप सुमुखस्वरूप !!
हे विघ्नरूप मोदस्वरूप !!
हे मंगलमूर्ती प्रमोद स्वरूप !!
हे गज आनन एकदन्त !!
हे अनेक दन्तार्चित तेजरूप !!
हे हेरम्ब !!
हे श्वेताम्बर !!
हे रक्ताम्बर !!
हे भाग्यविधाता !!
हे मंगलदाता !!
हे शिवतनय !!
हे शंकर्ता शिवस्वरूप !!
हे लम्बोदर !!
हे प्रथम पूज्य गणपति !!
आप का यह अवतरण जयन्ती जन्मोत्सव, प्राकट्य दिवस, परम मान्यता दिवस आप की विशेष कृपा के साथ आपकी पत्नी ऋद्धि - सिद्धि एवं आपके पुत्र शुभ - लाभ की निरन्तर साक्षात् उपस्थिति से हम सभी के लिए अत्यन्त ही मंगलदायक हो।।
डॉ. कौशल दत्त शर्मा ज्योतिषाचार्य
कल्पतरु ज्योतिष शोध संस्थान
नीम का थाना राजस्थान
9414467988
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लेखक: [डॉ कौशल दत्त शर्मा ,सेवानिवृत्त प्राचार्य- संस्कृत शिक्षा]
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