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यह उपवास सप्ताह के दिवस बृहस्पतिवार व्रत कथा को रखा जाता है. किसी भी माह के शुक्ल पक्ष में अनुराधा नक्षत्र और गुरुवार के योग के दिन इस व्रत की शुरुआत करना चाहिए। नियमित सात व्रत करने से गुरु ग्रह से उत्पन्न होने वाला अनिष्ट नष्ट होता है।कथा और पूजन के समय मन, कर्म और वचन से शुद्ध होकर मनोकामना पूर्ति के लिए बृहस्पति देव से प्रार्थना करनी चाहिए। पीले रंग के चंदन, अन्न, वस्त्र और फूलों का इस व्रत में विशेष महत्व होता है।

 
विधि

सूर्योदय से पहले उठकर स्नान से निवृत्त होकर पीले रंग के वस्त्र पहनने चाहिए। शुद्ध जल छिड़ककर पूरा घर पवित्र करें। घर के ही किसी पवित्र स्थान पर बृहस्पतिवार की मूर्ति या चित्र स्थापित करें। तत्पश्चात पीत वर्ण के गंध-पुष्प और अक्षत से विधिविधान से पूजन करें। इसके बाद निम्न मंत्र से प्रार्थना करें-

धर्मशास्तार्थतत्वज्ञ ज्ञानविज्ञानपारग। विविधार्तिहराचिन्त्य देवाचार्य नमोऽस्तु ते॥ तत्पश्चात आरती कर व्रतकथा सुनें।

बृहस्पतिवार व्रत के दिन क्या करें

इस दिन एक समय ही भोजन किया जाता है। व्रत करने वाले को भोजन में चने की दाल अवश्य खानी चाहिए। बृहस्पतिवार के व्रत में कंदलीफल (केले) के वृक्ष की पूजा की जाती है।
लाभ

बृहस्पतिवार व्रत के पूजन से स्त्री-पुरुष को वृहस्पतिदेव की अनुकम्पा से धन-संपत्ति का अपार लाभ होता है। परिवार में सुख तथा शांति रहती है। स्त्रियों के लिए बृहस्पतिवार का व्रत बहुत शुभ फल देने वाला है। बृहस्पतिवार की पूजा के पश्चात कथा सुनने का विशेष महत्व है। बृहस्पतिवार के व्रत करने और कथा सुनने से विद्या का बहुत लाभ होता है। बृहस्पतिवार का नियमित व्रत रखने वाली स्त्री की सभी मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं।

बृहस्पतिवार व्रत कथा
प्राचीन समय की बात है- एक बड़ा प्रतापी तथा दानी राजा था । वह प्रत्येक गुरुवार को व्रत रखता एवं पूजन करता था । यह उसकी रानी को अच्छा न लगता । न वह व्रत करती और न ही इसी को एक पैसा दान में देती । राजा को भी वह ऐसा करने से मना किया करती । एक समय की बात है कि राजा शिकार खेलने वन को चले गए । घर पर रानी और दासी थी । उस समय गुरु बृहस्पति साधु का रूप धारण कर राजा के दरवाजे पर भिक्षा मांगने आए । साधु ने रानी से भिक्षा मांगी तो वह कहने लगी, "हे साधु महाराज! मैं इस दान और पुण्य से तंग आ गई हूं । आप कोई ऐसा उपाय बताएं, जिससे यह सारा धन नष्ट हो जाए तथा मैं आराम से रह सकूं ।"
साधु रूपी बृहस्पतिदेव ने कहा, "हे देवी! तुम बड़ी विचित्र हो । संतान और धन से भी कोई दुखी होता है, अगर तुम्हारे पास धन अधिक है तो इसे शुभ कार्यों में लगाओ, जिससे तुम्हारे दोनों लोक सुधरें ।"
परंतु साधु की इन बातों से रानी खुश नहीं हुई । उसने कहा, "मुझे ऐसे धन की आवश्यकता नहीं, जिसे मैं अन्य लोगों को दान दूं तथा जिसको संभालने में ही मेरा सारा समय नष्ट हो जाए।"
साधु ने कहा, "यदि तुम्हारी ऐसी इच्छा है तो जैसा मैं तुम्हे बताता हूं तुम वैसा ही करना । बृहस्पतिवार के दिन घर को गोबर से लीपना, अपने केशों को पीली मिट्टी से धोना, केशों को धोते समय स्नान करना, राजा से हजामत बनाने को कहना, भोजन में मांस-मदिरा खाना, कपड़ा धोबी के यहां धुलने डालना । इस प्रकार सात बृहस्पतिवार करने से तुम्हारा सब धन नष्ट हो जाएगा।" इतना कहकर साधु बने बृहस्पतिदेव अंतर्धान हो गए ।
साधु के कहे अनुसार करते हुए रानी को केवल तीन बृहस्पतिवार ही बीते थे कि उसकी समस्त धन-संपत्ति नष्ट हो गई । भोजन के लिए परिवार तरसने लगा । एक दिन राजा रानी से बोला, "हे रानी! तुम यहीं रहो, मैं दूसरे देश को जाता हूं, क्योंकि यहां पर मुझे सभी जानते है । इसलिए मैं यहां कोई छोटा कार्य नहीं कर सकता ।" ऐसा कहकर राजा परदेस चला गया । वहां वह जंगल से लकड़ी काटकर लाता और शहर में बेचता । इस तरह वह अपना जीवन व्यतीत करने लगा ।
इधर, राजा के बिना रानी और दासी दुःखी रहने लगीं । एक समय जब रानी और दासियों को सात दिन बिना भोजन के रहना पड़ा, तो रानी ने अपनी दासी से कहा, "हे दासी! पास ही के नगर में मेरी बहन रहती है । वह बड़ी धनवान है । तू उसके पास जा और कुछ ले आ ताकि थोड़ा-बहुत गुजर-बसर हो जाए।"
दासी रानी की बहन के पास गई । उस दिन बृहस्पतिवार था । रानी की बहन उस समय बृहस्पतिवार की कथा सुन रही थी । दासी ने रानी की बहन को अपनी रानी का संदेश दिया, लेकिन रानी की बहन ने कोई उत्तर नहीं दिया । जब दासी को रानी की बहन से कोई उत्तर नहीं मिला तो वह बहुत दुखी हुई । उसे क्रोध भी आया । दासी ने वापस आकर रानी को सारी बात बता दी । सुनकर, रानी ने अपने भाग्य को कोसा ।
उधर, रानी की बहन ने सोचा कि मेरी बहन की दासी आई थी, परंतु मैं उससे नही बोली, इससे वह बहुत दुखी हुई होगी । कथ सुनकर और पूजन समाप्त कर वह अपनी बहन के घर गई और कहने लगी, "हे बहन! मैं बृहस्पतिवार का व्रत कर रही थी । तुम्हारी दासी गई परंतु जब तक कथा होती है, तब तक न उठते हैं और न बोलते हैं, इसीलिए मैं नहीं बोली । कहो, दासी क्यों गई थी?"
रानी बोली, "बहन! हमारे घर अनाज नहीं था।" ऐसा कहते-कहते रानी की आंखें भर आईं । उसने दासियों समेत भूखा रहने की बात भी अपनी बहन को बता दी । रानी की बहन बोली, "बहन देखो! बृहस्पतिदेव भगवान सबकी मनोकामना पूर्ण करते हैं । देखो, शायद तुम्हारे घर में अनाज रखा हो ।"
यह सुनकर दासी घर के अंदर गई तो वहां उसे एक घड़ा अनाज का भरा मिल गया । उसे बड़ी हैरानी हुई, क्योंकि उसने एक-एक बर्तन देख लिया था । उसने बाहर आकर रानी को बताया । दासी रानी से कहने लगी, "हे रानी! जब हमको अन्न नहीं मिलता तो हम व्रत ही तो करते हैं, इसलिए क्यों न इनसे व्रत और कथा की विधि पूछ ली जाए, हम भी व्रत किया करेंगे ।" दासी के कहने पर रानी ने अपनी बहन से बृहस्पतिवार व्रत के बारे में पूछा । उसकी बहन ने बताया, "बृहस्पतिवार के व्रत में चने की दाल और मुनक्का से विष्णु भगवान का केले की जड़ में पूजन करें तथा दीपक जलावें । पीला भोजन करें तथा कथा सुनें । इससे गुरु भगवान बृहस्पति प्रसन्न होते हैं, मनोकामना पूर्ण करते हैं।" व्रत और पूजन की विधि बताकर रानी की बहन अपने घर लौट गई ।
रानी और दासी दोनों ने निश्‍चय किया कि बृहस्पतिदेव भगवान का पूजन जरूर करेंगे । सात रोज बाद जब बृहस्पतिवार आया तो उन्होंने व्रत रखा । घुड़साल में जाकर चना और गुड़ बीन लाई तथा उसकी दाल से केले की जड़ तथा विष्णु भगवान का पूजन किया । अब पीला भोजन कहां से आए । दोनों बड़ी दुखी हुई । परंतु उन्होंने व्रत किया था इसलिए बृहस्पतिदेव भगवान प्रसन्न थे । एक साधारण व्यक्ति के रूप में वे दो थालों में सुंदर पीला भोजन लेकर आए और दासी को देकर बोले, "हे दासी! यह भोजन तुम्हारे लिए और तुम्हारी रानी के लिए है, इसे तुम दोनों ग्रहण करना।"
दासी भोजन पाकर बहुत प्रसन्न हुई । उसने रानी को सारी बात बताई ।
उसके बाद से वे प्रत्येक बृहस्पतिवार को गुरु भगवान का व्रत और पूजन करने लगीं । बृहस्पति भगवान की कृपा से उनके पास धन हो गया । परंतु रानी फिर पहले की तरह आलस्य करने लगी । तब दासी बोली, "देखो रानी! तुम पहले भी इस प्रकार आलस्य करती थीं, तुम्हें धन के रखने में कष्ट होता था, इस कारण सभी धन नष्ट हो गया । अब गुरु भगवान की कृपा से धन मिला है तो फिर तुम्हें आलस्य होता है । बड़ी मुसीबतों के बाद हमने यह धन पाया है, इसलिए हमें दान-पुण्य करना चाहिए । अब तुम भूखे मनुष्यों को भोजन कराओ, प्याऊ लगवाओ, ब्राह्मणों को दान दो, कुआं-तालाब-बावड़ी आदि का निर्माण करवाओ, मंदिर-पाठशाला बनवाकर ज्ञान दान दो, कुंवारी कन्याओंका विवाह करवाओ अर्थात धन को शुभ कार्यों में खर्च करो, जिससे तुम्हारे कुल का यश बढ़े तथा स्वर्ग प्राप्त हो और पितर प्रसन्न हों । दासी की बात मानकर रानी शुभ कर्म करने लगी । उसका यश फैलने लगा ।
एक दिन रानी और दासी आपस में विचार करने लगीं कि न जाने राजा किस दशा में होंगे, उनकी कोई खोज खबर भी नहीं है । उन्होंने श्रद्धापूर्वक गुरु (बृहस्पति) भगवान से प्रार्थना की कि राजा जहां कहीं भी हों, शीघ्र वापस आ जाएं ।
उधर, राजा परदेस में बहुत दुखी रहने लगा । वह प्रतिदिन जंगल से लकड़ी बीनकर लाता और उसे शहर में बेचकर अपने दुखी जीवन को बड़ी कठिनता से व्यतीत करता । एक दिन दुखी हो, अपनी पुरानी बातों को याद करके वह रोने लगा और उदास हो गया ।
उसी समय राजा के पास बृहस्पतिदेव साधु के वेष में आकर बोले, "हे लकड़हारे! तुम इस सुनसान जंगल में किस चिंता में बैठे हो, मुझे बतलाओ ।" यह सुन राजा के नेत्रों मे जल भर आया । साधु की वंदना कर राजा ने अपनी संपुर्ण कहानी सुना दी । महात्मा दयालु होते हैं । वे राजा से बोले, "हे राजा! तुम्हारी पत्‍नी ने बृहस्पतिदेव के प्रति अपराध किया था, जिसके कारण तुम्हारी यह दशा हुई । अब तुम किसी प्रकार की चिंता मत करो । भगवान तुम्हें पहले से अधिक धन देंगे । देखो, तुम्हारी पत्‍नी ने बृहस्पतिवार का व्रत प्रारंभ कर दिया है । अब तुम भी बृहस्पतिवार का व्रत करके चने की दाल व गुड़ जल के लोटे में डालकर केले का पूजन करो । फिर कथा कहो या सुनो । भगवान तुम्हारी सब कामनाओं को पूर्ण करेंगे ।" साधु की बात सुनकर राजा बोला, "हे प्रभो! लकड़ी बेचकर तो इतना पैसा भी नहीं बचता, जिससे भोजन करने के उपरांत कुछ बचा सकूं । मैंने रात्रि में अपनी रानी को व्याकुल देखा है । मेरे पास कोई साधन नहीं, जिससे इसका समाचार जान सकूं । फिर मैं बृहस्पतिदेव की क्या कहानी कहूं, यह भी मुझको मालूम नहीं है।" साधु ने कहा, "हे राजा! मन मे बृहस्पति भगवान के पूजन-व्रत का निश्‍चित करो । वे स्वयं तुम्हारे लिए कोई राह बना देंगे । बृहस्पतिवार के दिन तुम रोजाना की तरह लकड़िया लेकर शहर में जाना । तुम्हें रोज से दुगना धन प्राप्त होगा । जिससे तुम भलीभांति भोजन कर लोगे तथा बृहस्पतिदेव की पूजा का सामान भी आ जाएगा । जो तुमने बृहस्पतिवार की कहानी के बारे में पूछा है, वह इस प्रकार है-
बृहस्पतिदेव की कहानी प्राचीनकाल में एक बहुत ही निर्धन ब्राह्मण था । उसके कोई संतान नहीं थी । वह नित्य पूजा-पाठ करता, उसकी स्त्री न स्नान करती और न किसी देवता का पूजन करती । इस कारण ब्राह्मण देवता बहुत दुखी रहते थे ।
भगवान की कृपा से ब्राह्मण के यहां एक कन्या उत्पन्न हुई । कन्या बड़ी होने लगी । प्रातः स्नान करके वह भगवान विष्णु का जप करती । बृहस्पतिवार का व्रत भी करने लगी । पूजा-पाठ समाप्त कर पाठशाला जाती तो अपनी मुट्ठी में जो भरकर ले जाती और पाठशाला जाने के मार्ग में डालती जाती । लौटते समय वही जौ स्वर्ण के हो जाते तो उनको बीनकर घर ले आती । एक दिन वह बालिका सूप में उन सोने के जौ को फटककर साफ कर रही थी कि तभी उसकी मां ने देख लिया और कहा, "हे बेटी! सोने के जौ को फटकने के लिए सोने का सूप भी तो होना चाहिए।"
दूसरे दिन गुरुवार था । कन्या ने व्रत रखा और बृहस्पतिदेव से सोने का सूप देने की प्रार्थना की । बृहस्पतिदेव ने उसकी प्रार्थना स्वीकार कर ली । रोजाना की तरह वह कन्या जौ फैलाती हुई पाठशाला चली गई । पाठशाला से लौटकर जब वह जौ बीन रही थी तो बृहस्पतिदेव की कृपा से उसे सोने का सूप मिला । उसे वह घर ले आई और उससे जौ साफ करने लगी । परंतु उसकी मां का वही ढंग रहा ।
एक दिन की बात है । कन्या सोने के सूप में जब जौ साफ कर रही थी, उस समय उस नगर का राजकुमार वहां से निकला । कन्या के रूप को देखकर वह उस पर मोहित हो गया । राजमहल आकर वह भोजन तथा जल त्यागकर, उदास होकर लेट गया ।
राजा को जब राजकुमार द्वारा अन्न-जल त्यागने का समाचार ज्ञात हुआ तो अपने मंत्रियों के साथ वह अपने पुत्र के पास गया और कारण पूछा । राजकुमार ने राजा को उस लड़की के घर का पता भी बता दिया । मंत्री उस लड़की के घर गया । मंत्री ने ब्राह्मण के समक्ष राजा की और से निवेदन किया । कुच ही दिन बाद ब्राह्मण की कन्या का विवाह राजकुमार के साथ संपन्न हो गया ।
कन्या के घर से जाते ही ब्राह्मण के घर में पहले की भांति गरीबी का निवास हो गया । एक दिन दुखी होकर ब्राह्मण अपनी पुत्री से मिलने गए । बेटी ने पिता की अवस्थ अको देखा और अपनी मां का समाचार पूछा । ब्राह्मण ने सभी हाल कह सुनाया । कन्या ने बहुत-सा धन देकर अपने पिता को विदा कर दिया । लेकिन कुछ दिन बाद फिर वही हाल हो गया । ब्राह्मण फिर अपनी कन्या के यहां गया और सभी हाल कहा तो पुत्री बोली, "हे पिताजी! आप माताजी को यहां लिवा लाओ । मैं उन्हे वह विधि बता दूंगी, जिससे गरीबी दूर हो जाए।" ब्राह्मण देवता अपनी स्त्री को साथ लेकर अपनी पुत्री के पास राजमहल पहुंचे तो पुत्री अपनी मां को समझाने लगी, "हे मां! तुम प्रातःकाल स्नानादि करके विष्णु भगवान का पूजन करो तो सब दरिद्रता दूर हो जाएगी।" परंतु उसकी मां ने उसकी एक भी बात नहीं मानी । वह प्रातःकाल उठकर अपनी पुत्री का बचा झूठन खा लेती थी ।
एक दिन उसकीपुत्री को बहुत गुस्सा आया, उसने अपनी मां को एक कोठरी में बंद कर दिया । प्रातः उसे स्नानादि कराके पूजा-पाठ करवाया तो उसकी मां की बुद्धि ठीक हो गई ।
इसके बाद वह नियम से पूजा-पाठ करने और प्रत्येक बृहस्पतिवार को व्रत रखने लग । इस व्रत के प्रभाव से मृत्यु के बाद वह स्वर्ग को गई । वह ब्राह्मण भी सुखपूर्वक इस लोक का सूख भोगकर स्वर्ग को प्राप्त हुआ । इस तरह कहानी कहकर साधु देवता वहां से लोप हो गए ।
धीरे-धीरे समय व्यतीत होने पर फिर बृहस्पतिवार का दिन आया । राजा जंगल से लकड़ी काटकर शहर में बेचने गया । उसे उस दिन और दिनों से अधिक धन मिला । राजा ने चन, गुड़ आदि लाकर बृहस्पतिवार का व्रत किया । उस दिन से उसके सभी क्लेश दूर हुए । परंतु जब अगले गुरुवार का दिन आया तो वह बृहस्पतिवार का व्रत करना भूल गया । इस कारण बृहस्पति भगवान नाराज हो गए ।
उस दिन उस नगर के राजा ने विशाल यज्ञ का आयोजन किया था अपने समस्त राज्य में घोषणा करवा दी कि सभी मेरे यहां भोजन करने आवें । किसी के घर चूल्हा न जले । इस आज्ञा को जो न मानेगा उसको फांसी दे दी जाएगी ।
राजा की आज्ञानुसार राज्य के सभी वासी राजा के भोज मे सम्मिलित हुए लेकिन लकड़हारा कुछ देर से पहुंचा, इसीलिए राजा उसको अपने साथ महल में ले गए । जब राजा लकड़हारे को भोजन करा रहे थे तो रानी की दृष्टि उस खूंटी पर पडी, जिस पर उसका हार लटका हुआ था । उसे हार खूंटी पर लटका दिखाई नहीं दिया । रानी को निश्चय हो गया कि मेरा हार इस लकड़हारे ने चुरा लिया है । उसी समय सैनिक बुलवाकर उसको जेल में डलवा दिया ।
लकड़हारा जेल में विचार करने लगा कि न जाने कौन-से पूर्वजन्म के कर्म से मुझे यह दुख प्राप्त हुआ और जंगल में मिले साधु को याद करने लगा । तत्काल बृहस्पतिदेव साधु के रूप में प्रकट हो गए और कहने लगे, "अरे मूर्ख! तूने बृहस्पति देवता की कथा नहीं की, इसी कारण तुझे दुख प्राप्त हुआ है । अब चिंता मत कर । बृहस्पतिवार के दिन जेलखाने के दरवाजे पर तुझे चार पैसे जड़े मिलेंगे, उनसे तू बृहस्पतिवार की पूजा करना तो तेरे सभी कष्ट दूर हो जाएंगे ।"
अगले बृहस्पतिवार उसे जेल के द्वार पर चार पैसे मिले । राजा ने पूजा का सामान मंगवाकर कथा कही और प्रसाद बांटा । उसी रात्रि में बृहस्पतिदेव ने उस नगर के राजा को स्वप्न में कहा, "हे राजा! तूने जिसे जेल में बंद किया है, उसे कल छोड़ देना । वह निर्दोष है ।" राजा प्रातःकाल उठा और खूंटी पर हार टंगा देखकर लकड़हारे को बुलाकर क्षमा मांगी तथा राजा के योग्य सुंदर वस्त्र आभूषण भेंट कर उसे विदा किया ।
गुरुदेव की आज्ञानुसार राजा अपने नगर को चल दिया । राजा जब नगर के निकट पहुम्चा तो उसे बड़ा ही आश्चर्य हुआ । नगर में पहले से अधिक बाग, तालाब और कुएं तथा बहुत-सी धर्मशालाएं, मंदिर आदि बने हुए थे । राजा ने पूछा कि यह किसका बाग और धर्मशाला है । तब नगर के सब लोक कहने लगे कि यह सब रानी और दासी द्वारा बनवाए गए हैं । राजा को आश्चर्य हुआ और गुस्सा भी आया कि उसकी अनुपस्थिति में रानी के पास धन कहां से आया होगा ।
जब रानी ने यह खबर सुनी कि राजा आ रहे हैं तो उसने अपनी दासी से कहा, "हे दासी! देख, राजा हमको कितनी बुरी हालत में छोड़ गए थे । वह हमारी ऐसी हालत देखकर लौट न जाएं, इसलिए तू दरवाजे पर खड़ी हो जा ।" रानी की आज्ञानुसार दासी दरवाजे पर खड़ी हो गई और जब राजा आए तो उन्हें अपने साथ महल में लिवा लाई । तब राजा ने क्रोध करके अपनी तलवार निकाली और पूछने लगा, "बताओ, यह धन तुम्हैं कैसे प्राप्त हुआ है?" तब रानी ने सारी कथा कह सुनाई ।
राजा ने निश्चय किया कि मैं रोजाना दिन में तीन बार कथा कहा करूंगा तथा रोज व्रत किया करूंगा । अब हर समय राजा के दुपट्टे में चने दाल बंधी रहती तथा दिन में तीन बार कथा कहता ।
एक रोज राजा ने विचार किया कि चलो अपनी बहन के यहां हो आऊं । इस तरह का निश्‍चय कर राजा घोड़े पर सवार हो अपनी बहन के यहां चल दिया । मार्ग में उसने देखा कि कुछ आदमी एक मुर्दे को लिए जा रहे हैं । उन्हें रोककर राजा कहने लगा, "अरे भाइयो! मेरी बृहस्पति की कथा सुन लो ।" वे बोले, "लो, हमारा तो आदमी मर गया है, इसको अपनी कथा की पड़ी है!" परंतु कुछ आदमी बोले, "अच्छा कहो, हम तुम्हारी कथा भी सुनेंगे ।" राजा ने दाल निकाली और कथा कहनी शुरू कर दी । जब कथा आधी हुई तो मुर्दा हिलने लगा और जब कथा समाप्त हुई तो राम-राम करके वह मुर्दा खड़ा हो गया ।
राजा आगे बढ़ा । उसे चलते-चलते शाम हो गई । आगे मार्ग में उसे एक किसान खेत में हल चलाता मिला । राजा ने उससे कथा सुनने का आग्रह किया, लेकिन वह नहीं माना ।
राजा आगे चल पड़ा । राजा के हटते ही बैल पछाड़ खाकर गिर गए तथा किसान के पेट मे बहुत जोर से दर्द होने लगा ।
उसी समय किसान की पत्‍नी रोटी लेकर आई । उसने जब देखा तो अपने पुत्र से सब हाल पूछा । बेटे ने सभी हाल बता दिया । बुढ़िया दौड़ी-दौड़ी उस घुड़सवार के पास गई और उससे बोली, "मैं तेरी कथा सुनूंगी, तू अपनी कथा मेरे खेत पर ही चलकर कहना ।" राजा ने लौटकर बुढ़िया के खेत पर जाकर कथा कही, जिसके सुनते ही बैल खड़े हो गए तथा किसान के पेट का दर्द भी बंद हो गया ।
राजा अपनी बहन के घर पहुंच गया । बहन ने भाई की खूब मेहमानी की । दूसरे रोज प्रातःकाल राजा जागा तो वह देखने लगा कि सब लोग भोजन कर रहे हैं । राजा ने अपनी बहन से जब पूछा, "ऐसा कोई मनुष्य है, जिसने भोजन नहीं किया हो । जो मेरी बृहस्पतिवार की कथा सुनले!" बहन बोली, "हे भैया! यह देश ऐसा ही है । पहले यहां के लोग भोजन करते हैं, बाद में अन्य काम करते हैं ।" फिर वह एक कुम्हार के घर गई, जिसका लड़का बीमार था । उसे मालूम हुआ कि उसके यहां तीन दिन से किसी ने भोजन नहीं किया है । रानी ने अपने भाई की कथा सुनने के लिए कुम्हार से कहा । वह तैयार हो गया । राजा ने जाकर बृहस्पतिवार की कथा कही, जिसको सुनकर उसका लड़का ठीक हो गया । अब तो राजा की प्रशंसा होने लगी । एक दिन राजा ने अपनी बहन से कहा, "हे बहन! मैं अब अपने घर जाऊंगा, तुम भी तैयार हो जाओ ।" राजा की बहन ने अपनी सास से अपने भाई के साथ जाने की आज्ञा मांगी । सास बोली, "चली जा, परंतु अपने लड़कों को मत ले जाना, क्योंकि तेरे भाई के कोई संतान नहीं होती है ।" बहन ने अपने भाई से कहा, "हे भैया! मैं तो चलूंगी परंतु कोई बालक नहीं जाएगा !" अपनी बहन को भी छोड़कर दुखी मन से राजा अपने नगर को लौट आया । राजा ने अपनी रानी से सारी कथा बताई और बिना भोजन किए वह शय्या पर लेट गया । रानी बोली, "हे प्रभो! बृहस्पतिदेव ने हमें सब कुछ दिया है, वे हमें संतान अवश्य देंगे ।" उसी रात बृहस्पतिदेव ने राजा को स्वप्न में कहा, 'हे राजा! उठ, सभी सोच त्याग दे । तेरी रानी गर्भवती है।" राजा को यह जानकर बड़ी खुशी हुई । नवें महीने रानी के गर्भ से एक सुंदर पुत्र पैदा हुआ । तब राजा बोला, "हे रानी! स्त्री बिना भोजन के रह सकती है, परंतु बिना कहे नहीं रह सकती । जब मेरी बहन आए तुम उससे कुछ मत कहना ।" रानी ने 'हां' कर दी । जब राजा की बहन ने यह शुभ समाचार सुना तो वह बहुत खुश हुई तथा बधाई लेकर अपने भाई के यहां आई । रानी ने तब उसे आने का उलाहना दिया, "जब भाई अपने साथ ला रहे थे, तब टाल गई । उनके साथ न आई और आज अपने आप ही भागी-भागी बिना बुलाए आ गई!" तो राजा की बहन बोली, "भाई! मैं इस प्रकार न कहती तो तुम्हारे घर औलाद कैसे होती?"
बृहस्पतिदेव सभी कामनाएं पूर्ण करते हैं । जो सद्‌भावनापूर्वक बृहस्पतिवार का व्रत करता है एवं कथा पढ़ता है अथवा सुनता है और दूसरों को सुनाता है, बृहस्पतिदेव उसकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण करते हैं, उनकी सदैव रक्षा करते हैं ।
जो संसार में सद्‌भावना से गुरुदेव का पूजन एवं व्रत सच्चे ह्रदय से करते हैं, जैसी सच्ची भावना से रानी और राजा ने बृहस्पतिदेव की कथा का गुणगान किया, तो उनकी सभी इच्छाए बृहस्पतिदेव ने पूर्ण की । अनजाने में भी बृहस्पतिदेव की उपेक्षा न करे । ऐसा करने से सुख-शांति नष्ट हो जाती है । इसलिए सबको कथा सुनने के बाद प्रसाद लेकर जाना चाहिए । ह्रदय से उनका मनन करते हुए जयकारा बोलना चाहिए ।
॥इतिश्री बृहस्पतिवार व्रत कथा॥


Axact

HINDU ASTHA

हमारी कोशिश आपको सही बात पहुंचाने की है .

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