यहां उपखण्ड के आवां कस्बे में पारस्परिक सद्भावना व सौहार्द्र का प्रतीक दडा (फु टबॉल ) खेल मंकर संक्रांति को खेला जाता है । वही गोपाल भगवान का आंगन जहां करीब पांच हजार खिलाडी पसीने से लथपथ , गुत्थम - गुत्था होकर टूट पड़ते है भारी भरकम दडे पर । गोपाल भगवान को साक्षी मानते हुए कस्बे सहित एक दर्जन गांवों में अकाल ओर सुकाल का फ ैसला करने वाला दडा महोत्सव नववर्ष की शुरूआत के बाद मकर सक्रांती को प्रथम त्योहार के रूप में मनाया जाता है । हर साल की तरह गांव के गोपालजी भगवान के मंदिर चौक में आसपास के बारहपुरों के ग्रामीणों अपनी राजस्थानी पोशाकों में सज -धज कर इस रौचक व अद्भुत खेल को खेलने मकर संक्रांति के दिन सुबह दस बजे से ही आने लग जाएंगे । जब यह चौक इन रंग - बिरगें सजे देहाती ग्रामीणों व नौजवानों से खचाखच भर जाएगा, तब 80 से 100 किलो वजनी टाट व रस्सी से बनी गेंद जिसे दडा कहते हैं,गोपाल चौक के बीचों - बीच रिसायती गढ में से निकाल कर डाल दी जाएगी ओर फि र शुरू हो जाएगा यह रोमांचक खेल । दर्शकदीद्र्या का रूप होगी मकानों की छतें बारहपुरा से आए इन ग्रामीणों को खेल में जोश दिलाने के लिए रंग बिरंगे कपडों में सजी महिलाएं भी गोपाल चौक के चारों और मकानों की छतों पर बैठ जाएगी । ये महिलाएं खिलाडियों लगातार का होसला बढाती रहती है।
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देवली न्यूज- यहां  उपखण्ड के आवां कस्बे में पारस्परिक सद्भावना व सौहार्द्र का प्रतीक दडा (फु टबॉल ) खेल मंकर संक्रांति को खेला जाता है  । वही गोपाल भगवान का आंगन जहां करीब पांच हजार खिलाडी पसीने से लथपथ , गुत्थम - गुत्था होकर टूट पड़ते है  भारी भरकम  दडे पर । गोपाल भगवान को साक्षी मानते हुए कस्बे सहित एक दर्जन गांवों में अकाल ओर सुकाल का फ ैसला करने वाला दडा महोत्सव नववर्ष की शुरूआत के बाद मकर सक्रांती को प्रथम त्योहार के रूप में मनाया जाता है । हर साल की तरह गांव के गोपालजी भगवान के मंदिर चौक में आसपास के बारहपुरों के ग्रामीणों अपनी राजस्थानी पोशाकों में सज -धज कर इस रौचक व अद्भुत खेल को खेलने मकर संक्रांति के दिन सुबह दस बजे से ही आने लग जाएंगे । जब यह चौक इन रंग - बिरगें सजे देहाती ग्रामीणों व  नौजवानों से खचाखच भर जाएगा, तब 80 से 100 किलो वजनी टाट व रस्सी से बनी गेंद जिसे दडा कहते हैं,गोपाल चौक के बीचों - बीच रिसायती गढ में से निकाल कर डाल दी जाएगी ओर फि र शुरू हो जाएगा यह रोमांचक खेल । दर्शकदीद्र्या का रूप होगी मकानों की छतें बारहपुरा से आए इन ग्रामीणों को खेल में जोश दिलाने के लिए रंग बिरंगे कपडों में सजी महिलाएं भी गोपाल चौक के चारों  और मकानों की छतों पर बैठ जाएगी । ये महिलाएं खिलाडियों लगातार  का होसला बढाती रहती है।
दो दरवाजों को बनाई जाती है गोल पोस्ट: दडे को फ ुटबॉल की तरह गोल पोस्ट के ओर धकेलने के लिए खेल के निर्णय के लिए प्राकृतिक रूप से दो गोल पोस्ट भी तय किए हुए हैं एक और अखनिया दरवाजा है, दूसरी ओर दूनी दरवाजा । आवंा के चारों तरफ  पहाडी इलाकों में बसे बारह गांव इस तरह से बंटे है कि आंवा में आने  वाले छह गांव के ग्रामीणों को दूनी दरवाजे से आना पडता है ओर छह गांवों के ग्रामीणों का आखनिया दरवाजे से । बस यही खिलाडियों का बटंवारा है । दूनी दरवाजे की ओर से आने वाले ग्रामीण इस दडे को अखनिया दरवाजे की ओर धकेलते है, जबकि बाकी छह गांवों के लोग जोर लगाने में जुट जाते हैं ओर दडें को दूनी दरवाजे को ले जाने में लगे रहते हैं ।
इस प्रकार लगता हैं अकाल सुकाल का पता : लोगो का माना  है कि फ ुटबाल  आवां में खेले जा रहे दडे का सुधरा हुआ रूप है। दडा खेल देश की आजादी के पहले से चला आ रहा हे । इसकी हार - जीत से खुशहाली का पूर्वानुमान लगाया जाता है,इस खेल से यह मान्यता भी जुडी है कि यदि दडा अखनिया दरवाजे की ओर चला जाए तो समझो अकाल से क्षेत्र के लोगो को रूबरू होना पडेगा। यदि दडा दूनी दरवाजे की तरफ  चला जाए तो पो बारह यानी खेत लहलहांएगे ओर अमन चैन रहेगा ।


दडे का निर्माण इस प्रकार किया जाता हैं :-
यह खेल मकर संक्र ांति को ही खेला जाता है । दडा (फु टबाल)हर साल इसे खेलने के बाद गढ की बावडी में डाल देते है, जिसे मकर संक्र ांति के दो दिन पहले निकाला जाता है । टाट चढकर इसे फि र गूंथकर तैयार कर एक रात के लिए पानी में भिगोने के लिए बावडी में डाल दिया जाता है, ताकि दडा ओर वजनी हो जाए । मकर संक्राति के दिन आठ -दस आदमी इसे उठाकर जब गोपाल चौक में लाते है । इस दडे का निर्माण भी राव राजा राजेन्द्र सिंह के छोटे भाई जयेन्द्र सिंह द्वारा करवाया जाता है । तथा उनियारा रिसायत ने आज भी इस खेल को जिंदा रखा है । उनियारा रिसायत के राव राजा स्व.सरदार सिंह अपनी सेना मेंनौजवानों की भर्ती करने के लिए परीक्षा के रूप में यह खेल आयोजित करते थें । वे देख लेते थे कि कौनसा  रणंबाकुरा हो सकता है, जिसे सेना में भर्ती किया जाए । अब न रिसायतें बची हे ओर न ही उनकी फ ौज ,फि र भी राज परिवार द्वारा जारी यह लोक कला और  संस्कृ ति का प्रतीक यह खेल अब भी जिंदा है ।

दोनो और से विना रैफि र के अनुशासन से खेला जाता हैं यह मैंच : अनगनित खिलाडियों व बिना रैफ री के रिसायतकालीन समय से चला आ रहा यह खेले राग द्वैष व विवाद को त्यागकर खेला जाता है । तीन घण्टे केइस खेल में रामपुरा , बालापुरा ,संग्रामपुरा, कल्याणपुरा, सीतापुरा ,हनुमानपुरा, कंवरपुरा,बिशनपुरा सहित एक दर्जन गांवो केलोग शामिल होते हे। जो स्वत: ही दोनो दरवाजों में दो दलों में बंट जाते है । गोपाल भगवान केमंदिर के सामने गढ के चोक में दोपहर 12 बजे पंचो केसानिध्य में दडा लाया जाता है  ओर दूनी दरवाजे व अखनिया दरवाजे से आने वाले ग्रामीण खेलने को आतुर हो जाते हैं । दडा मैदान में लातेही खिलाडी दोड पडते है ओर बिना रैफ री के खेल शुरू हो जाता है ।

सभी वर्ग के दर्शक बढाते हैं जोश-दडा खेल के दौरान गोपाल चोक के चारों ओर मकानों , स्कूल ,गढ व मंदिरों की दीवारें दर्शको से अट जाती है । पुरूषों के साथ साथ महिलाएं,बच्चो व बुर्जग भी छतों पर चढकर दडे के अखनिया दरवाजे या दूनी दरवाजे की तरफ जाने पर हताश खिलाडियों का जोश बढाती है । खेल क ेदोरान कई पुरूषों के कपडे फ ट जाते है ।

गौरव चतुर्वेदी 

संवाददाता टोंक 


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