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मृत्यु के पार की यात्रा “नियर डेथ एक्सपीरियंस” : विज्ञान, अध्यात्म और चेतना का अद्भुत रहस्य -पंकज ओझा RAS (कैलाशी)

विशेष शोधपरक लेख


मृत्यु…

यह शब्द जितना छोटा है, उसका रहस्य उतना ही अथाह।

मानव सभ्यता के आरम्भ से ही मनुष्य यह जानने को उत्सुक रहा है कि आखिर मृत्यु के बाद क्या होता है? क्या सब कुछ समाप्त हो जाता है, या फिर कोई ऐसी चेतना भी है जो शरीर के नष्ट हो जाने के बाद भी बनी रहती है?

आधुनिक विज्ञान आज भी इस प्रश्न का अंतिम उत्तर नहीं दे पाया है, किन्तु “नियर डेथ एक्सपीरियंस” (Near Death Experience — NDE) ने इस रहस्य को और भी गहरा बना दिया है। दुनिया भर में हजारों ऐसे लोग मिले हैं जो मृत्यु के द्वार तक जाकर पुनः लौट आए और उन्होंने ऐसे अनुभव बताए जिन्हें सुनकर विज्ञान भी आश्चर्यचकित रह गया।

क्या है नियर डेथ एक्सपीरियंस?

जब कोई व्यक्ति कुछ समय के लिए चिकित्सकीय रूप से मृत घोषित हो जाता है — जैसे हृदय गति रुक जाना, सांस बंद हो जाना, मस्तिष्क की गतिविधि समाप्त हो जाना — और फिर पुनः जीवित हो उठता है, तब उस दौरान के अनुभवों को “नियर डेथ एक्सपीरियंस” कहा जाता है।

1970 के दशक में अमेरिका में इस विषय पर गंभीर वैज्ञानिक अध्ययन प्रारम्भ हुआ। प्रसिद्ध मनोचिकित्सक Raymond Moody ने सैकड़ों लोगों के अनुभवों का अध्ययन कर इसे “Near Death Experience” नाम दिया। उनकी प्रसिद्ध पुस्तक Life After Life ने पूरे विश्व को इस विषय की ओर आकर्षित किया।

बाद में Michael Sabom, Kenneth Ring, Elisabeth Kübler-Ross जैसे वैज्ञानिकों और मनोवैज्ञानिकों ने भी हजारों मामलों का अध्ययन किया।

लगभग सबके अनुभव एक जैसे क्यों?

शोधों में यह पाया गया कि अलग-अलग देशों, धर्मों और संस्कृतियों के लोगों के अनुभवों में आश्चर्यजनक समानताएँ थीं। अधिकांश लोगों ने बताया कि—

उन्होंने स्वयं को शरीर से बाहर निकलते देखा,

डॉक्टरों और परिजनों को अपने आसपास देखा,

एक अंधकारमय सुरंग से गुजरने का अनुभव किया,

तेज दिव्य प्रकाश दिखाई दिया,

गहन शांति और आनंद की अनुभूति हुई,

मृत संबंधियों या किसी दिव्य सत्ता से भेंट हुई,

और फिर किसी शक्ति द्वारा वापस शरीर में लौटा दिया गया।

कई लोगों ने कहा कि वे दीवारों के पार देख पा रहे थे, उन्हें अपने शरीर का मोह कुछ समय तक बना रहा, और वे डॉक्टरों के प्रयासों को ऊपर से देख रहे थे।

“मैं अपने शरीर के ऊपर उड़ रहा था…”

अमेरिका की एक महिला, जो वेंटिलेटर पर अंतिम सांसें ले रही थी, ने बताया कि उसकी आंखों की रोशनी लगभग समाप्त हो चुकी थी। फिर भी उसने ऑपरेशन थिएटर की मशीनों पर लिखे अंक पढ़े और स्वयं को ऊपर उड़ता हुआ देखा। कुछ समय बाद वह पुनः जीवित हो गई।

डॉक्टरों ने इस अनुभव को “Out of Body Experience” कहा।

ऐसे अनुभव दुनिया भर में हजारों बार दर्ज किए गए हैं।

मौत के बाद भी सब सुन रहा था वह व्यक्ति

मिसिसिपी निवासी वाल्टर “स्नो-बॉल” विलियम्स का मामला अत्यंत चर्चित हुआ। ऑपरेशन के दौरान हार्ट अटैक आने पर डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया।

कुछ मिनट बाद वे फिर जीवित हो उठे। होश में आने के बाद उन्होंने ऑपरेशन थिएटर में हुई हर गतिविधि का सटीक वर्णन किया। उन्होंने बताया कि डॉक्टर उन्हें बार-बार झटके दे रहे थे। उन्हें दो आवाजें सुनाई दे रही थीं—एक डॉक्टर की और दूसरी एक महिला की, जो उनका हाथ पकड़कर उन्हें ऊपर ले जाना चाहती थी।

अस्पताल कर्मचारियों ने माना कि उनकी बताई बातें बिल्कुल सही थीं।

बच्चों के अनुभव ने वैज्ञानिकों को चौंकाया

वैज्ञानिकों के अनुसार पांच से सात वर्ष तक के छोटे बच्चे मृत्यु की अवधारणा को ठीक से नहीं समझते। उन्हें धर्म, स्वर्ग-नरक या पुनर्जन्म जैसी मान्यताओं की जानकारी भी नहीं होती।

फिर भी कई बच्चों ने मृत्यु के निकट पहुँचकर वही अनुभव बताए जो वयस्क बताते हैं — जैसे शरीर से अलग होना, प्रकाश देखना और दिव्य शांति का अनुभव करना।

यही कारण है कि वैज्ञानिक केवल धार्मिक प्रभाव से इन अनुभवों को पूरी तरह नहीं समझा पा रहे।

धर्म और मृत्यु के अनुभव

हालाँकि कुछ अनुभव समान होते हैं, फिर भी व्यक्ति की धार्मिक पृष्ठभूमि उसके अनुभवों को प्रभावित करती दिखाई देती है।

हिंदू धर्म से जुड़े लोगों ने यमदूत, भैंसे पर यात्रा, भगवान कृष्ण या दिव्य लोकों का वर्णन किया।

बौद्ध धर्म से जुड़े लोगों ने बुद्ध, काले पहाड़, गहरे समुद्र और रंगीन पुष्पों वाले मार्ग देखने की बात कही।

ईसाई लोगों ने तेज प्रकाश और स्वर्गदूतों का अनुभव बताया।

व्यक्ति अपने जीवनभर के कर्मों को स्वयं जानता है। संभवतः मृत्यु के निकट उसकी चेतना उन्हीं संस्कारों और मान्यताओं के आधार पर अनुभव निर्मित करती हो।

विज्ञान क्या कहता है?

विज्ञान इन अनुभवों को पूरी तरह आत्मा का प्रमाण नहीं मानता, लेकिन इन्हें केवल भ्रम कहकर भी नहीं टाल पा रहा।

ऑक्सीजन की कमी

जब मस्तिष्क को पर्याप्त ऑक्सीजन नहीं मिलती, तब न्यूरॉन्स असामान्य तरीके से कार्य करने लगते हैं। इससे सुरंग जैसी रोशनी, तैरने का अनुभव या अजीब दृश्य दिखाई दे सकते हैं।

मस्तिष्क की अंतिम गतिविधि

कुछ वैज्ञानिक मानते हैं कि मृत्यु के समय मस्तिष्क अत्यधिक सक्रिय हो जाता है। यादें, भावनाएँ और अवचेतन चित्र एक साथ उभर सकते हैं। यही “जीवन चलचित्र” जैसा अनुभव देता है।

आउट ऑफ बॉडी एक्सपीरियंस

मस्तिष्क का “टेम्पोरो-पैरिएटल जंक्शन” शरीर की स्थिति और चेतना को नियंत्रित करता है। इसमें गड़बड़ी होने पर व्यक्ति स्वयं को शरीर से बाहर अनुभव कर सकता है।

किन्तु समस्या यह है कि कई लोगों ने ऐसी घटनाएँ सही-सही बताईं जिन्हें वे सामान्य स्थिति में देख ही नहीं सकते थे। यही तथ्य विज्ञान के लिए सबसे बड़ा रहस्य बना हुआ है।

मृत्यु वास्तव में कैसे होती है?

प्राकृतिक मृत्यु एक धीमी प्रक्रिया है।

पहले शरीर के जीव-कोष (Cells) मरने लगते हैं।

फिर ऊतक (Tissues) संवेदनाहीन होते हैं।

उसके बाद हृदय, फेफड़े और अन्य अंग कार्य करना बंद करते हैं।

अंत में मस्तिष्कीय गतिविधियाँ समाप्त होती हैं।

डॉक्टर मृत्यु की पहचान हृदय गति रुकने, सांस बंद होने, आंखों की स्थिरता और शरीर के तापमान गिरने से करते हैं।

कुछ समय बाद शरीर नीला पड़ने लगता है और बैक्टीरिया ऊतकों को विघटित करने लगते हैं। इसे “Somatic Death” कहा जाता है।

क्या ऊर्जा कभी समाप्त होती है?

आधुनिक भौतिक विज्ञान के अनुसार ऊर्जा कभी नष्ट नहीं होती, केवल रूप बदलती है।

Theory of Relativity और क्वांटम सिद्धांत पदार्थ को ऊर्जा और तरंगों के रूप में देखते हैं।

मानव शरीर भी ऊर्जा का संगठित रूप है। भारतीय अध्यात्म इसे “प्राण” कहता है। शरीर के चारों ओर फैले तेजोवलय (Aura), विचार तरंगें और चेतना — इन सबको कुछ वैज्ञानिक ऊर्जा के सूक्ष्म रूप मानते हैं।

संभव है कि मृत्यु के बाद भी यह चेतना किसी सूक्ष्म स्तर पर विद्यमान रहती हो।

सनातन अध्यात्म का दृष्टिकोण

भारतीय अध्यात्म हजारों वर्षों से आत्मा की अमरता का सिद्धांत प्रस्तुत करता आया है। Bhagavad Gita में भगवान Krishna कहते हैं—

“न जायते म्रियते वा कदाचित्…”

आत्मा न जन्म लेती है, न मरती है।

गीता का सिद्धांत “अंत मति सो गति” कहता है कि मृत्यु के समय व्यक्ति की अंतिम चेतना उसकी आगामी यात्रा को प्रभावित करती है।

पंकज ओझा RAS द्वारा किए गए निजी अध्ययन

लेखक पंकज ओझा RAS द्वारा कई मृत व्यक्तियों के परिजनों से विस्तृत बातचीत और अध्ययन किया गया। इन अनुभवों में अनेक समानताएँ सामने आईं।

कुछ मामलों में मरते हुए व्यक्ति ने अपने मृत पिता, मित्र या संबंधियों को “ले जाने आते” देखा।

एक मामले में उपस्थित व्यक्ति ने कथित रूप से आत्मा को धुएँ के समान आंखों के मार्ग से निकलते देखने का दावा किया।

एक महिला, जो अस्पताल से स्वस्थ होकर घर लौट रही थी, अचानक मंदिर दर्शन करने लगी और बोली—“पता नहीं फिर दर्शन कर पाऊँ या नहीं।” घर पहुँचकर उसने नए वस्त्र धारण किए और शांतिपूर्वक कहा—“अब मेरे जाने का समय आ गया है” — और थोड़ी देर बाद उसने प्राण त्याग दिए।

एक अन्य घटना में मृत्यु के निकट व्यक्ति भयभीत होकर यमदूतों के आने की बात कह रहा था। परिजनों द्वारा भगवान का स्मरण करवाने और दिव्य स्वरूप का वर्णन करने पर उसका भय शांत हो गया। उसने कहा कि अब दिव्य विमान और देवदूत दिखाई दे रहे हैं।


 कॉलेज की एक प्रोफेसर का नियर डेथ एक्सपीरियंस...


 3 साल पहले की बात है जयपुर में एक कॉलेज की प्रोफेसर थी जिनसे मेरी  रात को 10:00 बजे मेरी बात हुई थी.. तब वे एकदम स्वस्थ थी, 1 घंटे बाद उनका फोन आया तो रात के 11:00 रहे थे और वह काफी घबराई हुई थी उनके मुंह से आवाज नहीं निकल रही थी और वह बोलना चाह रही थी पर घर्र घर्र की सी आवाजें आ रही थी. मैंने उन्हें कहा क्या थोड़ा पानी पी लीजिए और बात करते हैं तेज सर्दियों के दिन थे...

 थोड़ी देर बाद उनका फोन आया तो उन्होंने बताया कि होने लगा कि जैसे वह मर चुकी है और आकाश में ट्रेवल कर रही है चार लोग उन्हें उठाए हुए लेकर की जा रहे हैं जिन्होंने काले कपड़े पहने हुए हैं और वह कोई भी बात नहीं कर रहे हैं..

 तब मैंने उनसे पूछा कि वह कहां आपको लेकर के जा रहे थे..

 तो उन्होंने बताया कि आकाश से एक रोशनी सी दिखाई दे रही थी और वह जैसे दिशा दे रही थी कि उधर की ओर जाना है...

 यह 15-20 मिनट तक चलता रहा उसके बाद एकदम से मेरी आंख खुली, उस समय तो मैंने उन्हें यह कहकर सुला दिया कि आपने कोई बुरा सपना देखा है... पर मुझे लग गया था कि उन्होंने नियर डेथ एक्सपीरियंस कर लिया है.. सुबह उनकी बेटी ने उनसे कहा कि मम्मी आप रात को एकदम ठंडी हो रखी थी और अपने दो-दो रजाइया ओढ़ी हुई थी, तब भी आप एकदम ठंडी क्यों थी और मैंने आपको बहुत आवाज दी और हिलाया भी पर अपने रेस्पॉन्ड नहीं किया.. मैं आपसे यह पूछने आई थी कि आप यहां सोएंगी या दूसरे कमरे में..

 अब यह बात बड़ी आश्चर्यजनक थी क्योंकि बेटी को नहीं पता था की मम्मी अब उसे शरीर में नहीं है उसे समय वह आकाश में ट्रेवल कर रही थी..

उन प्रोफेसर साहिबा ने जब यह नियर डेथ एक्सपीरियंस किया उसके बाद उनकी जिंदगी पूरे तौर पर बदल गई और वह एकदम शांत हो गई. बाद में मैंने उन्हें बताया कि आपने नियर डेथ एक्सपीरियंस किया है और आप जाकर रास्ते से लौट आई हैं.


क्या विज्ञान और अध्यात्म एक-दूसरे के करीब आ रहे हैं?

नियर डेथ एक्सपीरियंस आज विज्ञान और अध्यात्म के बीच खड़ा एक ऐसा रहस्य है जिसे दोनों अपनी-अपनी दृष्टि से समझने का प्रयास कर रहे हैं।

विज्ञान इसे मस्तिष्क की अंतिम गतिविधि, चेतना का भ्रम या न्यूरोलॉजिकल प्रक्रिया कहता है, जबकि अध्यात्म इसे आत्मा की यात्रा का संकेत मानता है।

किन्तु एक सत्य दोनों स्वीकारते हैं—

मृत्यु केवल अंत नहीं, बल्कि एक गहरा रहस्य है, जिसे मानव अभी पूरी तरह समझ नहीं पाया।

संभव है आने वाले समय में विज्ञान उन सूक्ष्म सत्यों तक पहुँच जाए जिन्हें भारतीय ऋषियों ने हजारों वर्ष पहले “आत्मा”, “प्राण” और “पुनर्जन्म” के रूप में स्वीकार किया था।

— ओम नमः शिवाय —