रक्षाबंधन 2026: जानें शुभ मुहूर्त, राजा बलि की पौराणिक कथा और रक्षा सूत्र का वैदिक महत्व
येन बद्धो बलिराजा, दानवेन्द्रो महाबलः।
तेन त्वामपि बध्नामि रक्षे मा चल मा चल॥
यह वही पवित्र मंत्र है जिसका उच्चारण रक्षासूत्र बाँधते समय किया जाता है। इस मंत्र में उस दिव्य रक्षा सूत्र का स्मरण किया जाता है, जिसे महाबली दानवेन्द्र राजा बलि को बाँधा गया था। यही कारण है कि रक्षाबंधन केवल एक पारिवारिक पर्व नहीं, बल्कि सनातन संस्कृति का महान वैदिक उत्सव माना जाता है।
त्योहारों का देश भारत और रक्षाबंधन
भारत विविध संस्कृति, परंपराओं और त्योहारों का देश है। इन्हीं पावन पर्वों में रक्षाबंधन का विशेष स्थान है। यह पर्व भाई-बहन के अटूट प्रेम, स्नेह, विश्वास, सम्मान और सुरक्षा के पवित्र बंधन का प्रतीक है।
श्रावण मास की पूर्णिमा तिथि पर पूरे देश में यह पर्व श्रद्धा, भक्ति और उत्साह के साथ मनाया जाता है। इस दिन बहनें अपने भाइयों की कलाई पर रक्षा-सूत्र (राखी) बाँधती हैं, उनका तिलक करती हैं और उनके सुख, समृद्धि, आरोग्य तथा दीर्घायु की कामना करती हैं। बदले में भाई जीवनभर अपनी बहन की रक्षा का संकल्प लेते हैं।
रक्षाबंधन का धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व
रक्षाबंधन का महत्व केवल भाई-बहन तक सीमित नहीं है। यह धर्म, कर्तव्य, विश्वास, त्याग और आत्मीयता का उत्सव है। हमारे धर्मग्रंथों में रक्षासूत्र की महिमा अनेक स्थानों पर वर्णित है।
राखी केवल एक धागा नहीं, बल्कि प्रेम, श्रद्धा, आस्था, निष्ठा और नि:स्वार्थ सेवा का प्रतीक है। जिस रक्षासूत्र में सच्चे भाव होते हैं, वह स्वयं भगवान को भी अपने भक्त की रक्षा करने के लिए बाध्य कर देता है। यही रक्षाबंधन का वास्तविक संदेश है।
राजा बलि और माता लक्ष्मी की पौराणिक कथा
हिन्दू पौराणिक परंपरा के अनुसार रक्षाबंधन का सबसे प्राचीन संबंध महाबली राजा बलि से माना जाता है।
जब दानवेन्द्र राजा बलि ने सौ यज्ञ पूर्ण कर तीनों लोकों पर अधिकार स्थापित करने का प्रयास किया, तब देवराज इन्द्र ने भगवान विष्णु से रक्षा की प्रार्थना की। भगवान विष्णु ने वामन अवतार धारण कर राजा बलि से तीन पग भूमि दान में माँगी।
दानवीर राजा बलि ने बिना किसी संकोच के दान देने का संकल्प लिया। तभी भगवान वामन ने विराट स्वरूप धारण कर प्रथम पग में सम्पूर्ण पृथ्वी तथा दूसरे पग में सम्पूर्ण स्वर्ग लोक नाप लिया।
अब तीसरे पग के लिए स्थान शेष नहीं था। तब राजा बलि समझ गए कि यह कोई साधारण ब्राह्मण नहीं, बल्कि स्वयं भगवान श्रीहरि विष्णु हैं। उन्होंने विनम्रतापूर्वक अपना सिर भगवान के चरणों में अर्पित कर दिया। भगवान विष्णु ने तीसरा चरण उनके मस्तक पर रखकर उन्हें पाताल लोक का अधिपति बना दिया।
राजा बलि की भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने उन्हें वरदान माँगने को कहा। राजा बलि ने निवेदन किया कि भगवान स्वयं उनके द्वार पर सदैव निवास करें। भगवान ने उनका यह वर स्वीकार कर लिया।
उधर वैकुण्ठ में भगवान विष्णु के न पहुँचने से माता लक्ष्मी चिंतित हुईं। वे श्रावण पूर्णिमा के दिन राजा बलि के पास पहुँचीं, उन्हें रक्षासूत्र बाँधा और अपना भाई बनाया। जब राजा बलि ने उपहार माँगने को कहा तो माता लक्ष्मी ने भगवान विष्णु को अपने साथ ले जाने का वर माँगा। राजा बलि ने सहर्ष यह वरदान प्रदान कर दिया।
इसी घटना के स्मरण में आज भी रक्षाबंधन पर रक्षा-सूत्र बाँधते समय राजा बलि का स्मरण किया जाता है और वही पवित्र मंत्र पढ़ा जाता है—
"येन बद्धो बलिराजा, दानवेन्द्रो महाबलः।
तेन त्वामपि बध्नामि रक्षे मा चल मा चल॥"
रक्षाबंधन 2026 का शुभ मुहूर्त
दिनांक
28 अगस्त 2026 (शुक्रवार)
श्रावण शुक्ल पक्ष पूर्णिमा
रक्षाबंधन के सर्वश्रेष्ठ शुभ मुहूर्त
प्रातःकाल
सुबह 6:20 बजे से 11:05 बजे तक
(चंचल, लाभ एवं अमृत की शुभ वेला)
दोपहर
12:20 बजे से 1:10 बजे तक
(शुभ वेला)
सायंकाल
5:20 बजे से 6:50 बजे तक
(चंचल वेला)
उपरोक्त सभी समय रक्षाबंधन के लिए अत्यंत शुभ एवं श्रेष्ठ माने गए हैं।
विशेष जानकारी
इस वर्ष रक्षाबंधन के दिन भद्रा का कोई दोष नहीं है।
अतः पूरे श्रद्धाभाव से शुभ मुहूर्त में रक्षा-सूत्र बाँधा जा सकता है।
रक्षा-सूत्र बाँधते समय अपने नगर के अनुसार स्थानीय शुभ मुहूर्त एवं चौघड़िया का भी ध्यान रखें।
भाई को मंगल तिलक कर, आरती उतारकर, रक्षा-सूत्र बाँधें तथा उपरोक्त वैदिक मंत्र का उच्चारण अवश्य करें।
वैदिक परंपरा के अनुसार मनाएँ रक्षाबंधन
इस वर्ष रक्षाबंधन को केवल एक सामाजिक पर्व नहीं, बल्कि वैदिक परंपरा के अनुरूप मनाने का संकल्प लें। विद्वान ब्राह्मण के सान्निध्य में भगवान श्रीगणेश का पूजन, मंगलाचरण तथा वैदिक मंत्रोच्चार के साथ रक्षासूत्र बाँधना अत्यंत शुभ और पुण्यदायी माना गया है।
आप सभी देशवासियों को रक्षाबंधन की हार्दिक शुभकामनाएँ
ईश्वर से प्रार्थना है कि यह पावन पर्व प्रत्येक परिवार में प्रेम, विश्वास, सौहार्द, सुख, समृद्धि, उत्तम स्वास्थ्य और मंगल का संचार करे। भाई-बहन का यह पवित्र बंधन सदैव अटूट बना रहे और सनातन संस्कृति की यह महान परंपरा निरंतर आगे बढ़ती रहे।
आप सभी देशवासियों, माताओं, बहनों एवं भाइयों को रक्षाबंधन की हार्दिक शुभकामनाएँ।
— पंडित आचार्य शुभम पाराशर गुरुजी
