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श्रावण मास में शिवलिंग पर गौदुग्ध से अभिषेक क्यों किया जाता है? जानिए वराह पुराण में वर्णित पौराणिक कथा


श्री कमल किशोर जी महाराज

 कथा व्यास एवं ज्योतिषाचार्य

सनातन परंपरा में श्रावण मास भगवान शिव की उपासना का सर्वश्रेष्ठ समय माना गया है। इस पवित्र महीने में श्रद्धालु शिवलिंग पर जल, बेलपत्र और विशेष रूप से देशी गौमाता के दूध से अभिषेक करते हैं। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि शिवलिंग पर दूध चढ़ाने की परंपरा कैसे प्रारंभ हुई? इसका उल्लेख वराह पुराण में एक अत्यंत रोचक और प्रेरणादायक कथा के रूप में मिलता है।


महर्षि ओरव की घोर तपस्या


वराह पुराण के अनुसार, महर्षि ओरव कठोर तपस्या में लीन थे। उनकी तपश्चर्या इतनी प्रबल थी कि देवराज इंद्र को भय होने लगा कि कहीं उनका इंद्रासन संकट में न पड़ जाए।


चिंतित होकर इंद्र भगवान शिव के पास पहुंचे और अपनी चिंता व्यक्त की। तब भगवान शिव ने स्वयं इस स्थिति का समाधान करने का निश्चय किया।


भगवान शिव का तीसरा नेत्र और आश्रम का दहन


भगवान शिव वन में पहुंचे, जहाँ महर्षि ओरव तपस्या कर रहे थे। शिवजी ने अपना तीसरा नेत्र खोल दिया, जिससे भयंकर अग्नि प्रकट हुई। उस अग्नि से महर्षि का सुंदर आश्रम, बगीचा तथा आसपास का वन जलकर भस्म हो गया।


जब महर्षि ओरव ने अपनी तपोभूमि को नष्ट हुआ देखा, तो वे अत्यंत क्रोधित हो उठे।


महर्षि का श्राप


क्रोध में आकर महर्षि ने श्राप दिया—


"जिसने मेरे आश्रम और बगीचे को अग्नि से भस्म किया है, वह स्वयं भी इसी प्रकार अग्निदाह से निरंतर पीड़ित होता रहे।"


श्राप देते ही महर्षि की वर्षों की तपस्या का प्रभाव समाप्त हो गया। वास्तव में यही उद्देश्य था—क्रोध उत्पन्न कर उनकी तपस्या को भंग करना।


भगवान शिव भी हुए श्राप से पीड़ित


महर्षि का श्राप व्यर्थ नहीं गया। कैलाश लौटते ही भगवान शिव के समस्त शरीर में असहनीय अग्निदाह होने लगा। उन्होंने अनेक लोकों में जाकर इस दाह को शांत करने का प्रयास किया, किंतु कहीं भी उन्हें राहत नहीं मिली।


अंततः भगवान शिव बदरिकाश्रम पहुंचे और भगवान श्रीहरि विष्णु से इस पीड़ा का उपाय पूछा।


भगवान विष्णु ने बताया समाधान


भगवान विष्णु ने कहा—


"हे महादेव! आप ब्रह्मर्षि के श्राप से दग्ध हैं। इस अग्निदाह को कोई देवता या औषधि शांत नहीं कर सकती। केवल गौमाता ही इस पीड़ा का निवारण कर सकती हैं।"


तब भगवान विष्णु और भगवान शिव दोनों ने मिलकर गौमाता की स्तुति की।


77 दिव्य गौमाताओं का प्रकट होना


भगवान की स्तुति से बदरिकाश्रम से 77 दिव्य गौमाताएँ प्रकट हुईं। उन्होंने अपने थनों से दूध की निर्मल धारा भगवान शिव पर प्रवाहित की। जैसे ही गौदुग्ध का अभिषेक हुआ, भगवान शिव के शरीर का समस्त अग्निदाह शांत हो गया।


तभी से प्रारंभ हुई दूधाभिषेक की परंपरा


भगवान शिव ने प्रसन्न होकर वरदान दिया—


"जो भक्त श्रावण मास में श्रद्धा और भक्ति से देशी गौमाता के दूध से मेरा अभिषेक करेगा, उसके पाप, ताप और संताप का नाश होगा तथा उसे शिवकृपा की प्राप्ति होगी।"


इसी दिव्य घटना के बाद से श्रावण मास में शिवलिंग पर गौदुग्ध से अभिषेक करने की परंपरा प्रचलित मानी जाती है।


श्रावण मास में भगवान शिव का दूधाभिषेक केवल एक धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि गौमाता के महत्व और शिवभक्ति का प्रतीक भी है। श्रद्धा, संयम और सदाचार के साथ किया गया अभिषेक भक्त के जीवन में आध्यात्मिक शांति, पुण्य और भगवान शिव की कृपा का माध्यम माना गया है।


नोट: यह कथा वराह पुराण में वर्णित पौराणिक मान्यता पर आधारित है। विभिन्न पुराणों और परंपराओं में इस प्रसंग के अलग-अलग रूप भी मिल सकते हैं।