श्रावण मास में शिव-पूजा
विधि, मंत्र, सामग्री, अभिषेक, विशेष काल और आध्यात्मिक फल
एक शास्त्रसम्मत, सरल एवं व्यावहारिक मार्गदर्शन — श्रावण 2026 (Shravan 2026)
Shravan 2026 is one of the holiest months in the Hindu calendar dedicated to Lord Shiva. During Shravan Somwar, millions of devotees perform Shiva Puja, Shiva Abhishek, chant Om Namah Shivaya, and observe Monday fasting. This complete Shravan 2026 Shiva Puja Guide explains the rituals, puja materials, mantras, timings, spiritual significance, and important dates according to traditional Hindu practices. (Shravan 2026)
भगवान शिव भारतीय आध्यात्मिक परम्परा में अनादि, अनन्त और सर्वव्यापक परम तत्त्व के रूप में पूजित हैं। वे केवल संहार के देवता नहीं, बल्कि सृजन, संरक्षण, ज्ञान, तप, वैराग्य, शस्त्र और शास्त्र, करुणा, योग और मोक्ष के भी अधिष्ठाता हैं।
शिव ही सदाशिव हैं, महादेव हैं, विश्वेश्वर हैं, नीलकण्ठ हैं, पशुपतिनाथ हैं, भूतनाथ हैं, मृत्युंजय हैं और काल से भी परे महाकाल हैं। उनके स्वरूप में एक ओर भस्म, नाग, श्मशान और वैराग्य है, तो दूसरी ओर करुणा, सौन्दर्य, गृहस्थ-धर्म और माता पार्वती के प्रति अगाध प्रेम है। इसीलिए वे विरोधाभासों के नहीं, बल्कि सम्पूर्ण जीवन के देवता हैं।
वेदों के रुद्र से लेकर उपनिषदों, आगमों, तंत्र-ग्रन्थों, पुराणों और भक्ति-साहित्य तक शिव-तत्त्व का विस्तृत वर्णन मिलता है। श्रीराम द्वारा रामेश्वरम् में शिवलिंग की स्थापना की धार्मिक परम्परा भी शिव की व्यापक आराधना का महान उदाहरण है।
भगवान शिव “आशुतोष” हैं, अर्थात शीघ्र प्रसन्न होने वाले। उनके पूजन में वैभव से अधिक भाव का महत्त्व है। यदि भक्त के पास विस्तृत सामग्री उपलब्ध न हो तो वह केवल शुद्ध जल, बेलपत्र अथवा मानसिक पूजा से भी शिव की आराधना कर सकता है।
“न वित्तेन न सामग्री-संचयेन शिवः प्रसन्नो भवति,
अपितु शुद्धभावेन भक्त्या च प्रसन्नो भवति।”
अर्थात भगवान शिव को प्रसन्न करने का सबसे बड़ा साधन धन अथवा सामग्री नहीं, बल्कि शुद्ध भावना, श्रद्धा और समर्पण है।
श्रावण मास 2026 की प्रमुख तिथियाँ- (Shravan 2026)
राजस्थान सहित उत्तर भारत में प्रचलित पूर्णिमान्त पंचांग के अनुसार वर्ष 2026 में श्रावण मास:
श्रावण प्रारम्भ: गुरुवार, 30 जुलाई 2026
श्रावण समाप्ति एवं श्रावणी पूर्णिमा: शुक्रवार, 28 अगस्त 2026
जयपुर के लिए चार श्रावण सोमवार होंगे: दृक पंचांग—जयपुर श्रावण सोमवार 2026�
प्रथम श्रावण सोमवार: 3 अगस्त 2026
द्वितीय श्रावण सोमवार: 10 अगस्त 2026
तृतीय श्रावण सोमवार: 17 अगस्त 2026
चतुर्थ श्रावण सोमवार: 24 अगस्त 2026
अन्य प्रमुख तिथियाँ:(Shravan 2026)
मंगला गौरी व्रत: 4, 11, 18 और 25 अगस्त 2026
श्रावण शिवरात्रि: मंगलवार, 11 अगस्त 2026
शिवरात्रि निशीथ पूजा: 11 अगस्त की रात्रि, 12 अगस्त को प्रातः 12:10 से 12:54 बजे तक, जयपुर के स्थानीय समयानुसार। श्रावण शिवरात्रि—जयपुर�
हरियाली अमावस्या: 12 अगस्त 2026
हरियाली तीज: 15 अगस्त 2026
नागपंचमी: 17 अगस्त 2026
श्रावणी पूर्णिमा एवं रक्षाबंधन: 28 अगस्त 2026
तिथि और मुहूर्त स्थान के अनुसार कुछ मिनट बदल सकते हैं। स्थानीय पूजा के लिए जयपुर अथवा अपने नगर का पंचांग देखें।
श्रावण मास का धार्मिक और आध्यात्मिक महत्त्व (Shravan 2026)
श्रावण मास वर्षा, हरियाली, शीतलता और नवजीवन का समय है। प्रकृति का यह रूप भगवान शिव के शान्त, करुणामय और कल्याणकारी स्वरूप से जुड़ा हुआ माना गया है।
देवशयनी एकादशी से चातुर्मास आरम्भ होता है। वर्ष 2026 में देवशयनी एकादशी का व्रत 25 जुलाई को और देवउठनी एकादशी 20 नवम्बर को है। देवशयनी एकादशी 2026� तथा देवउठनी एकादशी 2026�
लोक-धार्मिक मान्यता में भगवान विष्णु के योगनिद्रा में जाने के बाद चातुर्मास में शिव-आराधना, संयम, जप, तप, दान और स्वाध्याय का विशेष महत्त्व माना जाता है। सऊदी में ऐसा माना जाता है कि भगवान भोलेनाथ पृथ्वी का शासन संभाल लेते हैं. इस अवधि में अनेक समुदाय विवाह, गृहप्रवेश जैसे बड़े मांगलिक संस्कारों को स्थगित रखते हैं।
माता पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए कठोर तपस्या की थी। इसलिए श्रावण सोमवार के साथ मंगलवार को किया जाने वाला मंगला गौरी व्रत भी सौभाग्य, दाम्पत्य-सुख और पारिवारिक मंगल से जोड़ा गया है।
श्रावण में शिव-पूजा के परम्परागत लाभ-
(Shravan 2026)
मन की शान्ति और भावनात्मक स्थिरता
भय,
चिन्ता और नकारात्मकता में कमी,
आत्मसंयम और संकल्पशक्ति का विकास
पारिवारिक सौहार्द और दाम्पत्य-मंगल
रोग के समय मानसिक बल और आरोग्य की प्रार्थना,
कर्मों की शुद्धि और सद्बुद्धि
आध्यात्मिक उन्नति और वैराग्य
जीवन की बाधाओं का धैर्यपूर्वक सामना करने की शक्ति,
धर्मसम्मत धन, प्रतिष्ठा और समृद्धि की कामना
भगवान शिव के प्रति भक्ति और आत्मसमर्पण
ध्यान रहे कि पूजा का फल ईश्वर की कृपा, श्रद्धा, निष्ठा, व्यक्ति के कर्म, पुरुषार्थ और आचरण से जुड़ा होता है। किसी पूजा अथवा मंत्र को निश्चित भौतिक परिणाम की गारंटी नहीं माना जाना चाहिए।
शिव-पूजा की आवश्यक सामग्री (Shravan 2026)
अनिवार्य सामग्री-
वास्तव में शिव-पूजा के लिए केवल ये सामग्री भी पर्याप्त है:
शिवलिंग अथवा भगवान शिव का चित्र
स्वच्छ जल या गंगाजल-मिश्रित जल
बेलपत्र
दीपक
धूप अथवा अगरबत्ती
पुष्प
नैवेद्य या फल
शुद्ध श्रद्धा और सात्त्विक भाव
विस्तृत पूजन-सामग्री
जल, गंगाजल
दूध, दही, घी, शहद और मिश्री
पंचामृत
चन्दन
अक्षत अर्थात साबुत कच्चे चावल
भस्म या विभूति
बेलपत्र
सफेद पुष्प, कमल, आक या धतूरे का फूल
धतूरा और शमीपत्र
फल, मिठाई, मखाना, पंचमेवा
नारियल
धूप, अगरबत्ती, कपूर
घी या तिल के तेल का दीपक
रुई की बत्ती
रुद्राक्ष माला
मौली, जनेऊ और वस्त्र
सुपारी, लौंग और इलायची
माता पार्वती के लिए चुनरी, कुमकुम और श्रृंगार-सामग्री.
हवन की स्थिति में हवन-सामग्री, समिधा और शुद्ध घी.
पूजन-सामग्री का आध्यात्मिक अर्थ और परम्परागत फल-
सामग्री आध्यात्मिक अर्थ परम्परागत रूप से मानी गई कामना
शुद्ध जल-
सरलता, शुद्धता और जीवन
मन की शान्ति एवं दोष-शमन
गंगाजल-
पवित्रता और मोक्षभाव
पापक्षय एवं अन्तःकरण की शुद्धि
दूध-
शीतलता और पोषण
मानसिक शान्ति एवं पारिवारिक सुख
दही-
स्थिरता और पुष्टि
सौभाग्य, सन्तान-मंगल एवं स्थिरता
घी-
तेज और प्रकाश
ओज, तेज तथा आध्यात्मिक उन्नति
शहद-
मधुरता
वाणी और सम्बन्धों में मधुरता
मिश्री या शक्कर-
सौम्यता और संतुलन
प्रेम, संतोष एवं पारिवारिक सामंजस्य
गन्ने का रस-
परिश्रम का मधुर फल
आजीविका और समृद्धि की प्रार्थना
बेलपत्र-
त्रिगुण, त्रिनेत्र और त्रिदेव का प्रतीक
पापक्षय एवं शिवकृपा
चन्दन-
शीतलता और पवित्रता
क्रोध-शमन और एकाग्रता
भस्म-
देह की नश्वरता
वैराग्य और आत्मबोध
अक्षत-
अक्षुण्णता और पूर्णता
संकल्प की पूर्णता
सफेद पुष्प-
पवित्रता और सात्त्विकता
शान्ति एवं निर्मल बुद्धि
कमल-
संसार में रहते हुए निर्मलता
प्रतिष्ठा और आध्यात्मिक विकास
धतूरा/आक-
विष और विकारों का समर्पण
भय तथा नकारात्मक प्रवृत्तियों से मुक्ति
शमीपत्र-
संयम और शान्ति
बाधा-शमन एवं विजय की प्रार्थना
काले तिल-
सूक्ष्म शुद्धि और प्रायश्चित्त
ग्रहबाधा तथा पितृशान्ति की कामना
फल और नैवेद्य-
कृतज्ञता
संतोष एवं परिवार का पोषण
दीपक-
आत्मज्ञान
अज्ञान और निराशा का नाश
धूप-
वातावरण की पवित्रता
सकारात्मकता और मन की एकाग्रता
रुद्राक्ष-
शिव-स्मरण
जप, ध्यान और आत्मसंयम
दूध, घी, शहद और गन्ने के रस का अत्यधिक प्रयोग न करें। थोड़ी मात्रा से प्रतीकात्मक अभिषेक करके अन्त में पर्याप्त स्वच्छ जल चढ़ाएं। इससे पूजा-स्थल, जलस्रोत और पर्यावरण की रक्षा होती है।
श्रावण मास की सम्पूर्ण शिव-पूजन विधि (Shravan 2026)
1. शुद्धि एवं तैयारी
प्रातः स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें। पूजा-स्थान को साफ करके पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठें। दीपक और धूप प्रज्वलित करें।
सबसे पहले श्रीगणेश, माता पार्वती, नन्दी और शिवगणों का स्मरण करें।
2. संकल्प
दाहिने हाथ में जल, अक्षत और पुष्प लेकर कहें:
ममोपात्त समस्त दुरितक्षय द्वारा श्रीसाम्बसदाशिवप्रीत्यर्थं श्रावणमासे शिवपूजनं करिष्ये।
सोमवार का व्रत हो तो अन्त में कहें:
श्रावण सोमवार व्रतं च करिष्ये।
इसके बाद जल भूमि अथवा पात्र में छोड़ दें।
3. शिव-ध्यान-
कर्पूरगौरं करुणावतारं
संसारसारं भुजगेन्द्रहारम्।
सदा वसन्तं हृदयारविन्दे
भवं भवानीसहितं नमामि॥
4. अभिषेक
सबसे पहले शुद्ध जल चढ़ाएं। इच्छा और सामर्थ्य अनुसार अल्प मात्रा में दूध, दही, घी, शहद और मिश्री से पंचामृत अभिषेक करें। अन्त में पुनः स्वच्छ जल या गंगाजल-मिश्रित जल चढ़ाएं।
अभिषेक के समय निरन्तर जप करें:
ॐ नमः शिवाय।
5. पूजन-सामग्री अर्पण
क्रमशः चन्दन, अक्षत, भस्म, पुष्प, बेलपत्र, धतूरा, शमीपत्र, धूप, दीप और नैवेद्य अर्पित करें।
बेलपत्र स्वच्छ, अखण्ड और तीन पत्तियों वाला हो तो श्रेष्ठ माना जाता है। उसे अर्पित करते समय कहें:-
त्रिदलं त्रिगुणाकारं त्रिनेत्रं च त्रियायुधम्।
त्रिजन्मपापसंहारं बिल्वपत्रं शिवार्पणम्॥
6. मंत्र-जप और पाठ
अपनी क्षमता के अनुसार 11, 21, 51 या 108 बार मंत्र-जप करें। इसके बाद शिव चालीसा, शिवमहिम्न स्तोत्र, लिंगाष्टकम्, रुद्राष्टकम् अथवा श्रीरुद्र का पाठ किया जा सकता है।
7. नैवेद्य और आरती-
फल, मखाना, मिश्री अथवा सात्त्विक मिठाई का भोग लगाएं। इसके बाद कपूर अथवा दीपक से आरती करें।
8. क्षमा-प्रार्थना-
मन्त्रहीनं क्रियाहीनं भक्तिहीनं महेश्वर।
यत्पूजितं मया देव परिपूर्णं तदस्तु मे॥
9. पूजा-समर्पण-
एतत् सर्वं श्रीसाम्बसदाशिवार्पणमस्तु।
प्रमुख शिव मंत्र और उनके आध्यात्मिक लाभ
1. पंचाक्षरी एवं षडक्षरी मंत्र
मूल पंचाक्षरी मंत्र:
नमः शिवाय।
ॐ सहित षडक्षरी स्वरूप:
ॐ नमः शिवाय।
जप: 108 बार
लाभ: मन की शान्ति, शिव-स्मरण, एकाग्रता, आत्मविश्वास और आध्यात्मिक शुद्धि।
2. महामृत्युंजय मंत्र
ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्।
उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्॥
जप: 11, 21 या 108 बार
प्रार्थना: आरोग्य, दीर्घायु, भय-निवारण, संकट में मानसिक शक्ति और मृत्यु-भय से मुक्ति।
यह मंत्र चिकित्सा का विकल्प नहीं है। रोग की स्थिति में मंत्र-जप के साथ आवश्यक चिकित्सकीय उपचार भी अवश्य लें।
3. शिव गायत्री मंत्र
ॐ तत्पुरुषाय विद्महे महादेवाय धीमहि।
तन्नो रुद्रः प्रचोदयात्॥
जप: 11 या 108 बार
लाभ: सद्बुद्धि, विवेक, ज्ञान, आध्यात्मिक जागरण और सही निर्णय की शक्ति।
4. रुद्र मंत्र
ॐ नमो भगवते रुद्राय।
जप: 108 बार
लाभ: भय, संकट और मानसिक अस्थिरता से मुक्ति की प्रार्थना।
5. शान्ति के लिए सरल मंत्र
ॐ नमः शिवाय शान्ताय।
जप: 108 बार
लाभ: क्रोध, तनाव और मानसिक अशान्ति को शान्त करने में सहायक।
6. रोग और भय के समय संक्षिप्त मंत्र
ॐ जूं सः माम् पालय पालय।
यह मंत्र गुरु-परम्परा में प्राप्त हो तो ही विधिपूर्वक जप करें। सामान्य साधक के लिए महामृत्युंजय मंत्र पर्याप्त और श्रेष्ठ है।
7. अध्ययन और ज्ञान के लिए
शिव गायत्री का 21 बार जप करके प्रार्थना करें:
“हे महादेव! मुझे निर्मल बुद्धि, स्मरणशक्ति, विवेक और सत्य के मार्ग पर चलने की शक्ति प्रदान करें।”
8. आर्थिक स्थिरता के लिए
ॐ नमः शिवाय।
इसके साथ दारिद्र्य-दुःख-दहन शिवस्तोत्र का पाठ किया जा सकता है। इसका उद्देश्य धर्मसम्मत आजीविका, पुरुषार्थ, सद्बुद्धि और आर्थिक अनुशासन की प्रार्थना होना चाहिए।
श्रावण सोमवार व्रत-विधि-(Shravan 2026)
ब्रह्ममुहूर्त अथवा प्रातःकाल उठकर स्नान करें।
शिवलिंग पर जलाभिषेक करें।
पंचाक्षरी मंत्र का 108 बार जप करें।
व्रत का संकल्प लेकर सात्त्विक आचरण रखें।
सामर्थ्य अनुसार फलाहार, दुग्धाहार अथवा एक समय सात्त्विक भोजन करें।
स्वास्थ्य समस्या, गर्भावस्था, वृद्धावस्था या औषधि सेवन की स्थिति में कठोर उपवास न करें।
संध्या में प्रदोषकाल के आसपास दीप, धूप और शिव-आरती करें।
शिव चालीसा, महामृत्युंजय मंत्र या शिवमहिम्न स्तोत्र का पाठ करें।
व्रत का वास्तविक उद्देश्य भूखा रहना नहीं, बल्कि इन्द्रिय-संयम, सत्य, करुणा और शिव-स्मरण है।
शिव-पूजन के विशेष काल (Shravan 2026)
पूजन-काल स्वरूप महत्त्व
ब्रह्ममुहूर्त-
सूर्योदय से लगभग डेढ़ घंटा पूर्व
जप, ध्यान और आत्मशुद्धि
प्रातःकाल-
स्नान के बाद
दैनिक जलाभिषेक के लिए सरल और श्रेष्ठ
प्रदोषकाल-
त्रयोदशी पर सूर्यास्त के आसपास
शिव-पार्वती पूजन का विशेष समय
सोमवार-
पूरे श्रावण मास में
व्रत, अभिषेक और मंत्र-जप
निशीथकाल-
शिवरात्रि की मध्यरात्रि
गहन ध्यान और शिवरात्रि पूजन
चार प्रहर-
शिवरात्रि की सम्पूर्ण रात्रि
क्रमशः अभिषेक और जप
प्रदोषकाल का अर्थ प्रत्येक दिन सूर्यास्त से निश्चित “±90 मिनट” है। प्रदोष-व्रत की पूजा तब की जाती है जब त्रयोदशी तिथि सूर्यास्तकाल से संयुक्त हो। इसका सही समय स्थानीय पंचांग से लेना चाहिए।
महानिशीथ अथवा तांत्रिक साधना का समय स्थायी रूप से रात 1 से 3 बजे तक माना जा सकता है । ऐसी साधना केवल योग्य गुरु के निर्देशन में करनी चाहिए। सामान्य श्रद्धालु के लिए पंचाक्षरी और महामृत्युंजय मंत्र सर्वथा पर्याप्त हैं।
आर्थिक स्थिरता और समृद्धि के लिए सात्त्विक शिव-आराधना
धन-साधना का उद्देश्य लोभ अथवा चमत्कार नहीं, बल्कि धर्मसम्मत आय, सद्बुद्धि, परिश्रम, ऋणमुक्ति, संतोष और दानशीलता होना चाहिए।
श्रावण सोमवार को:-
शिवलिंग पर जल अथवा गंगाजल-मिश्रित जल चढ़ाएं।
थोड़ी मात्रा में दूध, शहद और गन्ने के रस से प्रतीकात्मक अभिषेक करें।
अन्त में स्वच्छ जल चढ़ाएं।
तीन, पाँच अथवा ग्यारह बेलपत्र अर्पित करें।
“ॐ नमः शिवाय” का 108 बार जप करें।
दारिद्र्य-दुःख-दहन शिवस्तोत्र या श्रीसूक्त का पाठ करें।
सफेद मिठाई या मिश्री का भोग लगाकर प्रसाद वितरित करें।
जरूरतमंद व्यक्ति को भोजन, अन्न, वस्त्र अथवा उपयोगी सामग्री दें।
किसी श्रमिक, कर्मचारी या सेवाकर्मी का उचित पारिश्रमिक समय पर देना भी श्रेष्ठ शिव-सेवा है।
अपनी आय का एक अंश सेवा, गौसेवा, शिक्षा अथवा अन्नदान में लगाएं।
शिवकृपा वहीं स्थायी होती है जहाँ सत्य, श्रम, न्याय, संयम और दान का वास हो।
विशेष सावधानियाँ-
शिवलिंग पर हल्दी, कुमकुम और सिंदूर सामान्यतः नहीं चढ़ाए जाते; इन्हें माता पार्वती या श्रीगणेश को अर्पित किया जा सकता है।
तुलसी भगवान विष्णु को प्रिय है; सामान्य शिवलिंग-पूजा में बेलपत्र को प्राथमिकता दें।
केतकी के पुष्प का प्रयोग अनेक शैव परम्पराओं में निषिद्ध माना गया है।
भांग पूजा की अनिवार्य सामग्री नहीं है। मंदिर या स्थानीय परम्परा में अर्पित करनी हो तो मर्यादा और कानून का पालन करें।
सरसों के तेल, इत्र, रस अथवा अन्य विशेष पदार्थों से अभिषेक केवल स्थानीय परम्परा और आचार्य के निर्देश से करें।
शिवलिंग के अत्यन्त निकट अथवा जलहरी के नीचे दीपक न रखें। इससे अग्नि-दुर्घटना, कालिख और अपवित्रता हो सकती है। दीपक सुरक्षित दूरी पर रखें।
जलहरी से निकलने वाले अभिषेक-द्रव्य को पैरों से न लांघें।
दूध और खाद्य सामग्री की बर्बादी न करें। प्रतीकात्मक मात्रा पर्याप्त है।
अशुद्ध, बासी, सड़ी अथवा दुर्गन्धयुक्त सामग्री अर्पित न करें।
पूजा में भय, अन्धविश्वास और किसी को हानि पहुँचाने वाले प्रयोगों से दूर रहें।
गुरु-दीक्षा की अपेक्षा रखने वाले बीजमंत्रों और तांत्रिक अनुष्ठानों का स्वतन्त्र प्रयोग न करें।
शान्ति मंत्र-
ॐ द्यौः शान्तिरन्तरिक्षं शान्तिः
पृथिवी शान्तिरापः शान्तिरोषधयः शान्तिः।
वनस्पतयः शान्तिर्विश्वे देवाः शान्तिर्ब्रह्म शान्तिः
सर्वं शान्तिः शान्तिरेव शान्तिः
सा मा शान्तिरेधि।
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥
अर्थ: आकाश, अन्तरिक्ष, पृथ्वी, जल, औषधियों, वनस्पतियों, देवताओं, ब्रह्म और सम्पूर्ण सृष्टि में शान्ति हो। हमारे भीतर और बाहर केवल शान्ति का विस्तार हो।
श्रावण मास केवल भगवान शिव पर जल चढ़ाने का पर्व नहीं, बल्कि अपने भीतर के विष को पहचानकर उसे शिवचरणों में समर्पित करने का अवसर है। क्रोध, अहंकार, लोभ, ईर्ष्या, भय और असत्य हमारे आन्तरिक विष हैं। इनका त्याग ही वास्तविक शिवाभिषेक है।
भगवान शिव का दर्शन हमें सिखाता है कि जीवन के यथार्थ से भागना नहीं, बल्कि उसे पूर्ण जागरूकता से स्वीकार करना चाहिए। शिव ज्ञान भी हैं और मौन भी; शक्ति भी हैं और करुणा भी; गृहस्थ भी हैं और महायोगी भी; भोग के नियन्ता भी हैं और वैराग्य के परम प्रतीक भी।
जो भक्त श्रावण मास में श्रद्धा, सत्य, संयम, सेवा, जप, ध्यान और सात्त्विक आचरण के साथ शिव की आराधना करता है, वह मानसिक शान्ति, आत्मबल और शिवकृपा का अनुभव करता है।
दर्शनं बिल्ववृक्षस्य स्पर्शनं पापनाशनम्।
अघोरपापसंहारं बिल्वपत्रं शिवार्पणम्॥
शिव समान दाता नहीं, विपद विदारणहार।
लज्जा मोरी राखियो, नन्दी के असवार॥
एक-दोय तीनों समय, जपै जो तेरो नाम।
सब पापों से मुक्त हो, बसे सदा शिवधाम॥
हर-हर महादेव!
ॐ नमः शिवाय। जय साम्ब सदाशिव।
Shiva Puja
©®पंकज ओझा, RAS
धर्मध्वजा-रक्षक





