यजुर्वेदीय यज्ञोपवीतधारियों एवं द्विजों को चाहिए कि रक्षाबंधन पर्व के दिन संगवकाल स्पर्शा शुद्ध पूर्णिमा को योग्य आचार्य की सन्निधि में शारीरिक शुद्धता के लिए पञ्चगव्य ग्रहण कर वर्ष पर्यन्त कृत पाप कर्मों के उत्सर्ग हेतु गणस्नान करते हुए श्रावणी अर्थात् उपाकर्म सम्पन्न करें।-
उदये सङ्गवस्पर्शे श्रुतौ पर्वणि चार्कभे।
कुर्युर्नभस्युपाकर्म ऋग्यजु: सामगा: क्रमात्।।
और भी कहा है -
श्रवणं श्रावणं पर्वं संगवस्पृक् यदा भवेत्।
तदा कर्मणि कुर्वीत न प्रातर्नापराह्निके।।
श्रावणी-उपाकर्म श्रावण मास की उदय व्यापिनी पूर्णिमा के पूर्वाह्न भाग में प्रसिद्ध है।गदाधरभाष्य में प्रचेता का मत उद्धृत करते हुए लिखा है कि:-
भवेदुपाकृति: पौर्णमास्यां पूर्वाह्न एव तु।।
और भी-
यजुर्वेदिभि: अस्यां श्रवणयुक्तायामयुक्तायां ग्रहण सङ्क्रान्त्यदूषितायां पूर्वाह्ने उपाकर्म कार्यम्।।
यहां दिन के दो भाग पूर्वाह्न-अपराह्न में प्रथम पूर्वाह्न ही ग्रहण किया है।
संगवस्पृश्य पूर्णिमा के पक्ष में जयसिंह कल्पद्रुम, निर्णय सिन्धु आदि में सिंहाभट्टीयम् का वचन उद्धृत किया है -
श्रावण: श्रवणं पर्व सङ्गवस्पृग्यदा भवेत्।
तदैवौदयिकं कार्यं नान्यदौदयिकं भवेत्।।
पूर्णिमा ग्रहण सङ्क्रान्ति नक्षत्र आदि से दूषित हो तो ही यजुर्वेदियों के लिए अन्य विकल्प हैं अन्यथा श्रावणी कर्म के लिए उदय व्यापिनी संगवकाल स्पर्शा पूर्णिमा ही पर्याप्त है।
पाराशरीय ग्रन्थ में महर्षि गार्ग्य के संगवात् परतो यदि... वचन का सहारा लेकर कतिपय महानुभाव श्रावणी उपाकर्म 27 अगस्त गुरुवार को लिख रहे हैं। विद्वज्जनों को इसे समझना चाहिए।-
श्रावणी पौर्णमासी तु संगवात् परतो यदि।
तदैवौदयिकी ग्राह्या नान्यदौदयिकी भवेत्।।
स्वाभाविक है सामान्य अर्थ देखकर हर कोई भ्रमित होगा। परन्तु टीकाकार लिखते हैं कि-
अत्र पौर्णमासीति श्रवणहस्तयोरुपलक्षणम्। तेन तावपि "सङ्गवकाल स्पृष्टौ" ग्राह्यौ।।
अर्थात् नक्षत्र आदि का संयोग तो उपलक्षण है मुख्य संगवकाल स्पर्शा पूर्णिमा ही ग्राह्य है।
अर्थात् संगवात् परतो में परत: का अर्थ संगवकाल स्पृष्टौ ही स्वीकार किया है न कि संगवकाल बाद तक पूर्णिमा व्याप्ति।
और भी विशेष -
श्री नारायण हरि ने उदयकालीन श्रावणी पूर्णिमा के दिन ही वेदों की रक्षा के लिए हयग्रीव अवतार लिया था।-
श्रावण्यां श्रवणे जात: पूर्वं हयशिरा हरि:।।
जब चतुर्दशी को मधु-कैटभ नामक राक्षस वेदों को चुराकर रसातल में चले गए थे तो वेदों की रक्षार्थ ही हयशिरा-हयग्रीव भगवान का अवतरण हुआ था। अतः वेदोपकरण उपाकर्म को उदयकालीन पूर्णिमा तिथि में ही मनाया जाना श्रेयस्कर होगा।
इन सब प्रमाणो से एक मुख्य पक्ष स्पष्ट होता है कि उपाकर्म में पौर्णमासी का प्राधान्य है न कि चतुर्दशी का या नक्षत्र आदि किसी विशेष योग का।
सङ्गवकाल स्थूल रूप से दिनमान के तीन-तीन मुहूर्त अर्थात् छः-छः घटी अर्थात् 144-144 मिनट के पांच भाग मानते हुए दूसरे भाग को संगवकाल कहा गया है।-
प्रातःकाल, संगवकाल, मध्याह्नकाल, अपराह्नकाल और सायाह्नकाल।
सूर्योदय से छः घटी तक प्रातःकाल और छः से बारह घटी तक संगवकाल माना जाता है।
छः मुहूर्त अर्थात् संगवकाल पर्यन्त तक औदयिकी पूर्णिमा उपलक्षण मात्र है। यदि पूर्व दिन औदयिकी पूर्णिमा जैसा संयोग मिल रहा हो तो अति प्रशस्त है। अन्यथा दूसरे दिन की उदय व्यापिनी संगव स्पर्शा पूर्णिमा ही ग्रहण करनी चाहिए। कर्म का प्रारम्भ ही लब्धि है।
अतः जो 28 अगस्त को 12 घटी से अधिक पूर्णिमा नहीं होने की स्थिति में पूर्व दिन 27 अगस्त को उपाकर्म लिख रहे हैं वह उचित नहीं है। यदि वे उचित मानते हैं तो उन महानुभावों को 27 अगस्त को भद्रा पश्चात् रात्रि 9.30 बजे बाद रक्षाबंधन का भी आदेश करना चाहिए क्योंकि रक्षाबंधन और उपाकर्म एक ही दिन होते आए हैं। कभी किसी ने अपने जीवन काल में चतुर्दशी को उपाकर्म और पूर्णिमा को रक्षाबंधन किया हो तो बताएं।
दूसरे दिन उदया पूर्णिमा छ: मुहूर्त से अधिक होती तो सभी वेदानुयायियों के लिए दूसरे दिन वैसे ही हो जाती।
दोनों दिन उदय व्यापिनी पूर्णिमा संगवकाल स्पर्शा होती तो पूर्व दिन उपाकर्म संगव में ही होता। पर ऐसी स्थिति नहीं है।
तिथि नक्षत्र आदि की विसंगतिपूर्ण स्थिति में उपाकर्म के लिए और भी स्पष्ट आदेश महापुरुषों ने दिए हैं-
यदा तु द्वितीय दिने सम्पूर्ण मुहूर्तत्रयं तदा यदा वा पूर्वदिने मुहूर्तार्धाद्यनन्तरं प्रवृत्तं द्वितीयदिने मुहूर्तद्वयादिपरिमितं भवति तदोत्तरदिन एवानुष्ठानम्।।
इस बार 28 अगस्त शुक्रवार को सूर्योदय व्यापिनी पूर्णिमा पूरे देश में छः से बारह घटी अर्थात् तीन मुहूर्त से अधिक व्याप्त है, संगवकाल स्पर्शा है और एकदेशव्यापिनी से भी अधिक होने से उपाकर्म के लिए अति प्रशस्त है।
अतः विनम्र अनुरोध है कि 28 अगस्त शुक्रवार को प्रातः संगवकाल व्यापिनी श्रावणी पूर्णिमा में श्रावणी उपाकर्म सम्पन्न कर शास्त्रीय वचनों को उपकृत करें।
संगवान्त: प्रातः प्रदोषान्त: सायमिति वचनात् श्रावणी उपाकर्म संगव काल में ही प्रारम्भ करना समुचित होगा। पूर्णिमा तो मुख्य पक्ष है ही।
उपाकर्म में भद्रा दोष नहीं होता है। रक्षाबंधन में भद्रा दोष होता है-
भद्रायां द्वे न कर्तव्ये श्रावणी फाल्गुनी तथा।
यहां "श्रावणी" शब्द रक्षाबंधन के अर्थ में है न कि उपाकर्म के अर्थ में। इस पंक्ति में कुछ महानुभाव श्रावणी का अर्थ श्रावणी-उपाकर्म निकालते हैं जो भ्रामक है।
यह महापर्व श्रावणी - उपाकर्म रक्षाबंधन वेदारंभ, शैक्षिक सत्रारम्भ व सत्र समापन, देववाणी पर्व, द्विजकर्मोत्सव, यज्ञोपवीत परिवर्तन पर्व, ब्राह्मण प्रतिष्ठा पर्व, आर्यसंरक्षण दिवस, संस्कृत भाषा दिवस आदि के रूप में मान्यता ले चुका है।
अपने अपने गृह्यसूत्रानुसार और वेदानुसार सभी के लिए श्रावणी - उपाकर्म यथाविधि करने के आदेश हैं।-
सर्वेऽपि स्वस्वगृह्योक्ता: काला अनुकल्पत्वेन व्यवस्थिता ज्ञेया:।।
उपाकर्म के लिए और भी लिखा है -
श्रावण्यां श्रावणीकर्म यथाविधि समाचरेत्।
(श्रावण्यां - श्रावणपौर्णमास्यां श्रवण नक्षत्रयुक्त: काल:)-
उपाकर्म तु कर्त्तव्यं श्रावण्यां श्रवणेन वा।
तथा
उपाकर्म प्रकुर्वन्ति क्रमात् सामर्ग्यजुर्विद:।
ग्रहसंक्रान्त्ययुक्तेषु हस्तश्रवणपर्वसु।।
वेदसंंस्कारकर्म्मणो नामधेयम् उपाकर्म
शास्त्रों में द्विजातियों के लिए उपनयन संस्कार के बाद वेदारम्भ संस्कार अभिहित है।
श्रावणी (उपाकर्म)पर दो कर्मों का प्राधान्य है। प्रथम उपाकरण अर्थात् उपाकर्म और दूसरा उत्सर्ग कर्म। पुराकाल में श्रावण शुक्ल पूर्णिमा को ही नूतन शैक्षिक सत्र पर वेदाध्ययन प्रारम्भ होता था और पौष - माघ में प्रचलित सत्र का अवसान भी। जो आजकल श्रावणी पर ही प्रतीकात्मक रूप से सम्पादित हो रहा है।
वर्षारम्भ पर वेदपाठ के उपक्रम में किया जाने वाला अनुष्ठान "उपाकर्म" कहलाता है।
पारस्करगृह्यसूत्र...
अथातोऽध्यायोपाकर्म
और साढ़े छह या साढ़े सात माह बाद या पुनः उपाकर्म आने पर सत्रावसान स्वरूप दीक्षान्त समारोह उपाकर्म "उत्सर्ग" कहलाता था।
पारस्करगृह्यसूत्र में पौष माघ में भी वेदोत्सर्ग कहा है।...
अर्धषष्ठान्मासानधीत्योत्सृजेयु:, अर्द्धसप्तमासान् वा।।
पूर्वमुपाकृतान् पुनरुपाकरणं यावन्नाधीयीरन्
आजकल उपाकर्म और उत्सर्ग दोनों एक ही दिन होने का प्रमाण श्रावणी के संकल्प में द्रष्टव्य है..
...वेदोत्सर्गोपाकर्माहं (वेदोत्सर्गोपाकरणं) करिष्ये
श्रावणी के दिन वर्ष पर्यन्त कृत पापकर्मों की दोषनिवृत्ति या दोषमुक्ति के प्रायश्चित्त स्वरूप विशिष्ट स्नान ऋषि पूजा एवं तर्पण आदि का विधान है।-
उदकान्तं गत्वात् - नद्याद्युदकसमीपगमनात्। ततो यथाविधि स्नात्वा माध्याह्निकं कर्म.. निर्वर्त्य सप्तर्षिपूजावंशानुपठनान्तरं..तर्पयेयु:..समापयेयु:..।
पापकर्मों को त्यागना उनका प्रायश्चित करना भी उत्सर्ग ही है।
संकल्प:-
...अध्यायोत्सर्गकर्मनिमित्तं गणस्नानमहं करिष्ये
वैसे यहां "गणस्नान" शब्द "उत्सर्ग" के अर्थ में ही है...
गणस्नानशब्देनोत्सर्गाख्यं कर्म
जब प्रकृति में वनस्पतियों का प्रादुर्भाव हो, श्रावण मास में श्रवण नक्षत्रयुत पूर्णिमा हो, हस्त नक्षत्रयुत पंचमी हो तो उपाकर्म होता है। ऐसे आदेश हैं।-
अध्यायानामुपाकर्म श्रावण्यां श्रवणेन तु।
हस्तेनौषधिभावे वा पंचम्यां श्रावणस्य तु।
ओषधीनां अपामार्गादीनां उत्पत्तौ सति...।
श्रावणी पूर्णिमा के दिन यदि ग्रहण या संक्रांति हो तो श्रावणी कर्म शुक्ल पंचमी को करना चाहिये।-
संक्रान्ति: ग्रहणं वापि पौर्णमास्यां यदा भवेत्।
उपाकृतिस्तु पंचम्यां कार्या वाजसनेयिभि:।
अर्थात् वाजसेनेयी आदि सभी शाखा वालों को श्रावणी कर्म ग्रहण व संक्राति युक्त पूर्णिमा में नहीं करना चाहिए। श्रावण शुक्ल पंचमी या ऋषि पंचमी के दिन करने के निर्देश भी हैं।
कर्क सिंह संक्रान्ति में नदियां रजस्वला रहती है। श्रावणी आदि कर्म में रजस्वला दोष नहीं होता है।
समुद्रगा अर्थात् बड़ी नदियों में तो कभी भी वर्षा ऋतु में स्नान दोष नहीं होता है।...
उपाकर्मणि चोत्सर्गे प्रेतस्नाने तथैव च।
चन्द्रसूर्योपरागे च रजोदोषो न विद्यते।।
श्रावणी-उपाकर्म द्विजमात्र का महानतम वैज्ञानिक एवं प्रकृतिपरक पर्व है। वेद, वेदवाणी, गुरु, सूर्य, गायत्री, देव, ऋषि और पितरों की आराधना और गुरु-शिष्य परम्परा का मुख्य आधार पर्व है। मूल रूप से गुरुकुलों की स्थापना मान्यता का पावन पर्व है। यह पर्व नद, नदी, जलस्त्रोत, वनस्पति और औषधीय वृक्षों की महत्ता दर्शाने का पर्व है।
श्रावणी-उपाकर्म व्यभिचारादिक पापकर्मों के प्रति भय पैदा कर पुनः पापकर्मो में संलिप्तता ना हो ऐसी जनजागृति का संकल्प दिवस भी है। जीवनमूल्यों के प्रति आबालवृद्ध को समर्पित करने का अद्भुत पर्व है। द्विजत्व की साधना को जीवन्त कर द्विजों को प्रकृष्ट प्रखर बनाने का अद्वितीय पर्व है।
इस पर्व के प्रति प्राण-प्रण से समर्पित द्विजों का विशेष रूप से कर्मनिष्ठ ब्राह्मणों का ब्रह्मत्व जाग्रत होता है और वे अद्भुत व्यक्तित्व के साथ अलौकिक ब्रह्मशक्ति के विशिष्ठ कृपा पात्र बन सकते हैं।
यह पर्व मानव मात्र को विषयाशक्तियों में संलिप्तता से मुक्ति देने का अनुपम साधन है। मानव के आभ्यन्तर बाह्य चरित्र को पारिमार्जित करने का सुअवसर है।
श्रावणी उपाकर्म उपसर्ग में पापकर्मों की निवृत्ति के लिए प्रायश्चित्त संकल्प (हेमाद्रि संकल्प), विशिष्ट पदार्थों से गणस्नान, संध्या, गायत्री-सूर्यपूजा, और वेदाध्ययन, स्वाध्याय के बाद अरुंधती, याज्ञवल्क्य, स्वगोत्र ऋषि पूजा के साथ सप्त ऋषिपूजन होता है।
नूतन यज्ञोपवीतों का पूजन कर नवीन यज्ञोपवीत धारण कर ऋषि वंशादि का परिचय करवाया जाता है।
आजकल के DNA शब्द को हमारे ऋषि-मुनियों ने "वंशानां ब्रुवणम्" के रूप में हज़ारों लाखों साल पहले ही परिभाषित कर दिया था। अर्थात् हम किस ऋषि की सन्तान है ऐसा परिभाषित करने के लिए ऋषि और ऋषियों की औरस संतानों की वंशावलियों का वाचन भी इस दिन किया जाता है।
मंत्रात्मक वंशावली का वाचन और श्रवण कर आत्म गौरव के साक्षात् दर्शन होते हैं। हम अभिभूत होते हैं कि हम अमुक ऋषि की संतान हैं। ऋषि वंशादि के श्रवण से स्वाभिमान का उदात्त भाव उन्नत भाल को और भी प्रकृष्ट बना देता है।
इस "राष्ट्रीय संस्कृति दिवस श्रावणी पर्व" में हम सभी को अपनी अपनी भागीदारी सुनिश्चित करनी चाहिए। मेरी मान्यता है कि चाहे कोई भी धर्म हो, सम्प्रदाय हो, समाज हो, संस्कृति हो, जाति हो परिवार हो वे तब ही आसमान छूते हैं जब इनके खेवनहार समर्पित हो। या इन्हें कोई राजनैतिक आश्रय व संरक्षण प्राप्त हो अन्यथा नहीं।
विशेष रूप से ब्राह्मणों को तो इस पर्व को आत्म सम्मान से जोड़ कर देखना ही चाहिए। प्रतिवर्ष जहां भी श्रावणी का आयोजन हो हम अधिकारपूर्वक उसमें अपनी सहभागिता सुनिश्चित करें। और नियमित प्रति दिन गायत्री मंत्र का जप करें।
हेमाद्रि चतुर्वर्गचिन्तामणि संस्कार गणपति आदि ग्रन्थकारों ने गृह्यसूत्रादिक के आधार पर उपाकर्म में श्रावणी पूर्णिमा के संदर्भ में "संगव काल" की उदार हृदय ग्राह्यता स्वीकार की है। फिर आज क्यों नहीं।
यह "संगवकाल" ही त्रिमुहूर्तव्यापिनी पूर्णिमा का मूल है।
*यजुर्वेदादिकों के लिए तो पूर्णिमा ही मुख्य पक्ष है। उनके लिए उत्तराषाढा श्रवण धनिष्ठा या पूर्ण संगवकाल मुख्य पक्ष कदापि शास्त्रीय नहीं रहा।
पं. कौशल दत्त शर्मा ज्योतिषाचार्य
सेवानिवृत्ति प्राचार्य - संस्कृत शिक्षा
नीमकाथाना राजस्थान
9414467988
