जलझूलनी (पद्मा) एकादशी
आषाढ़ शुक्ला देवशयनी एकादशी से देवप्रबोधनी एकादशी तक चार माह के लिए भगवान श्रीहरि शयन (देवशयन) करते हैं। दो माह से बांयी करवट सोए भगवान जलझूलनी एकादशी को ही दांयी करवट बदलते हैं। इसलिए इसे परिवर्तिनी एकादशी भी कहते हैं। इन तीनों एकादशियां के व्रत का विशेष माहात्म्य है।
संयोग से जलझूलनी एकादशी के दिन श्रवण नक्षत्र का योग बने तो इसी को विजया एकादशी भी कहते हैं। ऐसा योग कभी कभी बनता है।
साथ ही संयोग से एकादशी के दिन मध्याह्न में श्रवण नक्षत्र का योग हो, द्वादशी को श्रवण नक्षत्र स्पर्श भी न हो तो "वामन द्वादशी" भी एकादशी को ही मनानी चाहिए।
और यदि व्रत के दूसरे दिन अर्थात् भाद्रपद शुक्ल द्वादशी को श्रवण नक्षत्र पड़े तो दूसरा दिन हरिवासर कहलाता है। बुधवार का योग मिल जाए तो और भी पुण्यदायी है। ऐसी स्थिति में द्वादशी का भी व्रत करना चाहिए ऐसा शास्त्रकार कहते हैं।
आषाढ़ शुक्ला द्वादशी को अनुराधा नक्षत्र हो, जलझूलनी के दूसरे दिन द्वादशी को श्रवण नक्षत्र हो एवं देवोत्थानी के अगले दिन द्वादशी को रेवती नक्षत्र का संयोग हो तो द्वादशी का दिन हरिवासर कहलाता है। हरिवासर के दिन बुधवार का संयोग हो अर्थात् द्वादशी के दिन बुधवार भी हो तो महत्व की अभिवृद्धि करता है। दोनों दिन व्रत करने से अक्षय्य पुण्य प्राप्त होता है।
इस बार जलझूलनी के दूसरे दिन श्रवण नक्षत्र नहीं है अतः द्वादशी हरिवासर संज्ञक नहीं है।
वैसे द्वादशी का प्रथम पाद ही हरिवासर संज्ञक कहा गया है। संयोग से इन तीन एकादशियों के दूसरे दिन हरिवासर हो तो नक्षत्रों के प्रथम चरण के बाद पारण किया जा सकता है।
सभी गृहस्थियों और यतियों को सभी एकादशियों का व्रत करना चाहिए।
भगवान सभी अपनों को हरिभक्ति प्रदान करें।
मेरा प्रकाशित लेख पठनीय एवं संग्रहणीय है।
पं. कौशल दत्त शर्मा
नीमकाथाना राजस्थान
9414467988
