1100 वर्ष प्राचीन महालक्ष्मी मन्दिर में 16 दिवसीय महालक्ष्मी व्रत का पर्व 19 से 3अक्टूबर तक
जयपुर। गुलाबी नगरी जयपुर के चांदी की टकसाल क्षेत्र में स्थित प्राचीन श्री महालक्ष्मी मंदिर में इस वर्ष 16 दिवसीय महालक्ष्मी व्रत एवं पूजा का आयोजन 19 सितंबर 2026 से 3 अक्टूबर 2026 तक किया जाएगा। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार महालक्ष्मी व्रत माता लक्ष्मी की कृपा, सुख-समृद्धि, धन-धान्य और परिवार की मंगलकामना से जुड़ा महत्वपूर्ण व्रत माना जाता है।
मंदिर के महंत श्री राजेन्द्र कुमार शर्मा के अनुसार इस 16 दिवसीय महालक्ष्मी व्रत का विशेष धार्मिक महत्व है। इस दौरान माता महालक्ष्मी की विधि-विधान से पूजा, 16 प्रकार के भोग, 16 प्रकार के श्रृंगार और श्रीसूक्त की ऋचाओं के पाठ सहित विभिन्न धार्मिक अनुष्ठान किए जाते हैं।
पौराणिक मान्यताओं के इस महालक्ष्मी व्रत की कथा सतयुग में स्वर्ग के राजा देवराज इंद्र ने नारद जी से सुनी थी ओर इस व्रत को सपरिवार किया जिसके बाद उनके मान सम्मान यश धन की अपार वृद्धि हुई , द्वापर काल में महर्षि वेदव्यास जी ने हस्तिनापुर की महारानी गांधारी ओर कुन्ती को इस महान
महालक्ष्मी व्रत का धार्मिक महत्व बताया था तब से महारानी गांधारी ओर कुन्ती ने इस व्रत को करने का संकल्प लिया लगातार 16 दिनों तक इस व्रत को करने से सम्पूर्ण राज्य में सुख शांति एवं परिवार ,पुत्र पौत्र, धन, धान्य,की अपार वृद्धि हुई
माता सीताजी ने सुयोग्य वर प्रभु श्री राम जी को पाने के लिए यह व्रत किया था
जयपुर के महाराज राजा मानसिंह जी ने प्रति वर्ष इस 16 दिवसीय महालक्ष्मी व्रत को विधि विधान से किया था ओर चांदी की टकसाल में माता महालक्ष्मी का पूजन कर कन्या पूजा के साथ उद्यापन किया जिससे उनके मान सम्मान के साथ राजकोष में अपरा धन संपदा में वृद्धि हुई
आज भी माता महालक्ष्मी टकसाल में विराजित हैं और यहां आने वाले सभी भक्तो की मनोकामना पूर्ण करती है
इस महालक्ष्मी व्रत को श्रद्धा पूर्वक करने से पुराने से पुराने कर्जे ऋण से मुक्ति मिलती हैं और मान सम्मान में वृद्धि होती हैं
व्यापारी वर्ग में इस महालक्ष्मी व्रत विशेष महत्व मान्यता है जो भी व्यापारी , परिवार इस व्रत को पूरे विधि विधान से करता है या किसी विद्वान पंडित से ये 16 दिन का अनुष्ठान करवाता है तो उसके व्यापार में अपार धन की वृद्धि होती है और किसी को कर्जा चढ़ा हुआ हो तो वह उतरना शुरू हो जाता है
लगातार 16 दिनों तक चलने वाला महालक्ष्मी व्रत इस बार 19 सितम्बर 2026 को प्रारंभ होकर 03 अक्टूबर 2026 को पूर्ण होगा. हिंदू मान्यता के अनुसार इस व्रत को विधि-विधान से करने पर व्यक्ति के जीवन से जुड़ी आर्थिक समस्याएं दूर हो जाती हैं और मां महालक्ष्मी की कृपा से धन-धान्य का भंडार हमेशा भरा रहता है. मान्यता है कि इस व्रत से प्रसन्न होकर मां महालक्ष्मी पूरे साल भक्तो के घर में वास करती हैं.
महालक्ष्मी व्रत पूजा विधि
सबसे पहले एक चौकी पर मां लक्ष्मी और भगवान गणेश की मूर्ति की स्थापना करें। ध्यान रखें की मूर्ति का मुख पूर्व या पश्चिम दिशा में रखें।
इसके बाद थोड़ा से चावल डालकर लक्ष्मी जी के पास कलश की स्थापना करें। कलश के ऊपर एक नारियल में कपड़ा बांधकर रखें।
इसके बाद गणेशजी की और चावल की सोलह ढेरियां बनाएं। ये सोलह मातृका की प्रतीक हैं। नवग्रह और षोडश मातृका के बीच स्वास्तिक का चिन्ह बनाएं।
साथ ही ग्यारह दीपक, खील, बताशे, मिठाई, वस्त्र, आभूषण, चंदन का लेप, सिंदूर, कुमकुम, सुपारी, पान, फूल,,,, दूर्वा, चावल, लौंग, इलायची, केसर, कपूर, हल्दी, धूप, अगरबत्ती। इसके बाद विधा विधान के साथ पूजन करें। सबसे पहले कथा का पाठ करें अंत में भगवान गणेश और मां लक्ष्मी की आरती करें।
एक मिट्टी का हाथी भी स्थापित करे जिस पर माता महालक्ष्मी जी की प्रतिमा को अंतिम दिन विराजित कर दे
यह महालक्ष्मी व्रत भाद्रपद माह की शुक्ल पक्ष की राधाष्टमी से शुरू होकर अश्विन माह की कृष्ण पक्ष की कालष्टमी तक किया जाता है
इन 16 दिनों में माता को 16 तरह का भोग लगाया जाता है
16 सोलह तरह का श्रृंगार किया जाता है
16 षोडशोपचार से पूजा की जाती है
श्री सूक्त की 16 ऋचाओं से माता महालक्ष्मी का पाठ किया जाता है
इन 16 दिनों तक लगातार महालक्ष्मी का व्रत कर संध्या में पूजा करके व्रत खोला जाता है
महा लक्ष्मी माता को
16 कमल गट्टे की माला
16 श्रृंगार साड़ी ,बेस
16 भोग कड़ाई
16 फूल मखाने की माला
16 दीपक घी के
16 चूड़े ,
16 आसान
16 श्री सूक्त की पुस्तक
16 तरह के फल /फूल
16 तरह के सुखे मेवे
16 कन्याओं या पंडित को भोजन
ओर अपनी श्रद्धा अनुसार दान दक्षिणा अर्पण करनी चाहिए
Mahalakshmi Vrat 2026 FAQ
महालक्ष्मी व्रत 2026 कब शुरू होगा?
महालक्ष्मी व्रत 19 सितंबर 2026 से प्रारंभ होकर 3 अक्टूबर 2026 को पूर्ण होगा।
महालक्ष्मी व्रत कितने दिनों का होता है?
धार्मिक परंपरा के अनुसार महालक्ष्मी व्रत लगातार 16 दिनों तक किया जाता है।
महालक्ष्मी व्रत में क्या पूजा की जाती है?
माता महालक्ष्मी के साथ भगवान गणेश की पूजा की जाती है। पूजा में 16 प्रकार के भोग, श्रृंगार और अन्य पूजन सामग्री अर्पित करने की परंपरा बताई गई है।
महालक्ष्मी व्रत की पूजा कैसे करें?
चौकी पर माता लक्ष्मी और भगवान गणेश की स्थापना कर कलश स्थापित किया जाता है। इसके बाद विधि-विधान से पूजा, कथा और आरती की जाती है।
महालक्ष्मी व्रत का क्या महत्व है?
धार्मिक मान्यताओं में इस व्रत को सुख-समृद्धि, धन-धान्य और परिवार के मंगल से जोड़ा गया है।
जयपुर का महालक्ष्मी मंदिर कहां स्थित है?
जयपुर में चांदी की टकसाल क्षेत्र में स्थित प्राचीन महालक्ष्मी मंदिर में इस अवसर पर विशेष पूजा-अनुष्ठान आयोजित किए जाते हैं।

