॥ श्री गणेशाय नमः ॥
सनातन धर्म में भगवान गणेश को विघ्नहर्ता, बुद्धि और विवेक के देवता के रूप में पूजा जाता है। गणपति स्तवः में भगवान गणेश के केवल साकार स्वरूप की ही नहीं, बल्कि उनके निर्गुण, निराकार और परब्रह्म स्वरूप की भी स्तुति की गई है।
यह स्तव गणेश पुराण के उपासना खण्ड के 13वें अध्याय से संबंधित है। इसमें ब्रह्मा, विष्णु और महेश्वर भगवान गणेश की महिमा का वर्णन करते हैं।
॥ श्री गणपति स्तवः ॥
ब्रह्मविष्णुमहेशा ऊचुः ॥
श्लोक 1
अजं निर्विकल्पं निराकारमेकं
निरानन्दमद्वैतमानन्दपूर्णम् ।
परं निर्गुणं निर्विशेषं निरीहं
परब्रह्मरूपं गणेशं भजेम ॥ १॥
सरल हिंदी अर्थ:
हम उन भगवान गणेश का भजन करते हैं जो अजन्मा, निर्विकल्प, निराकार और अद्वितीय हैं। जो निर्गुण, निर्विशेष और किसी सांसारिक इच्छा से रहित हैं तथा परब्रह्म के स्वरूप हैं।
श्लोक 2
गुणातीतमाद्यं चिदानन्दरूपं
चिदाभासकं सर्वगं ज्ञानगम्यम् ।
मुनिध्येयमाकाशरूपं परेशं
परब्रह्मरूपं गणेशं भजेम ॥ २॥
सरल हिंदी अर्थ:
हम उन परम गणेश का स्मरण करते हैं जो तीनों गुणों से परे, आदि स्वरूप, चेतना और आनंद के स्वरूप हैं। जिन्हें ज्ञानी और मुनिजन ध्यान के द्वारा प्राप्त करने का प्रयास करते हैं और जो सर्वव्यापी हैं।
श्लोक 3
जगत्कारणं कारणज्ञानरूपं
सुरादिं सुखादिं युगादिं गणेशम् ।
जगद्व्यापिनं विश्ववन्द्यं सुरेशं
परब्रह्मरूपं गणेशं भजेम ॥ ३॥
सरल हिंदी अर्थ:
हम उन गणेश की उपासना करते हैं जो जगत के कारण हैं, देवताओं के आदि हैं, सुख के स्वरूप हैं और समस्त संसार में व्याप्त हैं। देवता और समस्त विश्व जिनकी वंदना करते हैं।
श्लोक 4
रजोयोगतो ब्रह्मरूपं श्रुतिज्ञं
सदा कार्यसक्तं हृदाऽचिन्त्यरूपम् ।
जगत्कारकं सर्वविद्यानिधानं
परब्रह्मरूपं गणेशं नताः स्मः ॥ ४॥
सरल हिंदी अर्थ:
हम उन भगवान गणेश को नमन करते हैं जो ब्रह्मा के स्वरूप में सृष्टि की रचना करते हैं, वेदों के ज्ञाता हैं और समस्त विद्याओं के आधार हैं।
श्लोक 5
सदा सत्त्वयोगं मुदा क्रीडमानं
सुरारीन् हरन्तं जगत्पालयन्तम् ।
अनेकावतारं निजाज्ञानहारं
सदा विष्णुरूपं गणेशं नताः स्मः ॥ ५॥
सरल हिंदी अर्थ:
हम उन गणेश को नमन करते हैं जो विष्णु स्वरूप में जगत का पालन करते हैं, देवताओं के शत्रुओं का नाश करते हैं और अनेक रूपों में अवतार लेकर संसार की रक्षा करते हैं।
श्लोक 6
तमोयोगिनं रुद्ररूपं त्रिनेत्रं
जगद्धारकं तारकं ज्ञानहेतुम् ।
अनेकागमैः स्वं जनं बोधयन्तं
सदा शर्वरूपं गणेशं नताः स्मः ॥ ६॥
सरल हिंदी अर्थ:
हम उन गणेश को नमन करते हैं जो रुद्र रूप में त्रिनेत्रधारी हैं, संसार का धारण और संहार करने वाले हैं तथा ज्ञान का मार्ग दिखाने वाले हैं।
श्लोक 7
तमःस्तोमहारं जनाज्ञानहारं
त्रयीवेदसारं परब्रह्मपारम् ।
मुनिज्ञानकारं विदूरे विकारं
सदा ब्रध्नरूपं गणेशं नताः स्मः ॥ ७॥
सरल हिंदी अर्थ:
हम उन भगवान गणेश को नमन करते हैं जो अज्ञान और अंधकार को दूर करते हैं, तीनों वेदों के सारस्वरूप हैं तथा मुनियों को ज्ञान प्रदान करते हैं।
श्लोक 8
निजैरौषधैस्तर्पयन्तं करोघैः
सुरौघान् कलाभिः सुधास्राविणीभिः ।
दिनेशांशुसन्तापहारं द्विजेशं
शशाङ्कस्वरूपं गणेशं नताः स्मः ॥ ८॥
सरल हिंदी अर्थ:
हम उन गणेश को नमन करते हैं जो औषधियों और अपनी शक्तियों के द्वारा प्राणियों का पोषण करते हैं तथा चंद्रमा के समान शीतलता प्रदान करने वाले हैं।
श्लोक 9
प्रकाशस्वरूपं नभोवायुरूपं
विकारादिहेतुं कलाकालभूतम् ।
अनेकक्रियानेकशक्तिस्वरूपं
सदा शक्तिरूपं गणेशं नताः स्मः ॥ ९॥
सरल हिंदी अर्थ:
हम उन भगवान गणेश को नमन करते हैं जो प्रकाश, आकाश और वायु आदि के स्वरूप हैं। जो काल और शक्ति के आधार हैं तथा अनेक प्रकार की क्रियाओं और शक्तियों के स्वरूप हैं।
श्लोक 10
प्रधानस्वरूपं महत्तत्त्वरूपं
धरावारिरूपं दिगीशादिरूपम् ।
असत्सत्स्वरूपं जगद्धेतुभूपं
सदा विश्वरूपं गणेशं नताः स्मः ॥ १०॥
सरल हिंदी अर्थ:
हम उन विश्वरूप गणेश को नमन करते हैं जो प्रकृति, महत्तत्त्व, पृथ्वी और जल आदि के स्वरूप हैं तथा इस समस्त जगत के मूल कारण हैं।
श्लोक 11
त्वदीये मनः स्थापयेदङ्घ्रियुग्मे
जनो विघ्नसङ्घान्न पीडां लभेत ।
लसत्सूर्यबिम्बे विशाले स्थितेऽयं
जनो ध्वान्तबाधां कथं वा लभेत ॥ ११॥
सरल हिंदी अर्थ:
जो व्यक्ति अपना मन भगवान गणेश के चरणों में लगा देता है, उसे विघ्नों से पीड़ा नहीं होती। जिस प्रकार चमकते हुए सूर्य के सामने अंधकार टिक नहीं सकता, उसी प्रकार गणेश भक्ति से अज्ञान और बाधाएँ दूर हो जाती हैं।
श्लोक 12
वयं भ्रामिताः सर्वथाऽज्ञानयोगाद्
अलब्ध्वा तवाङ्घ्रिं बहून्वर्षपूगान् ।
इदानीमवाप्तास्तवैव प्रसादात्
प्रपन्नान् सदा पाहि विश्वम्भराद्य ॥ १२॥
सरल हिंदी अर्थ:
हे प्रभु! अज्ञान के कारण हम लंबे समय तक भटकते रहे और आपके चरणों की शरण प्राप्त नहीं कर सके। अब आपकी कृपा से आपकी शरण में आए हैं। हे विश्व का पालन करने वाले प्रभु, हमेशा हमारी रक्षा करें।
श्री गणपति स्तवः का महत्व
श्री गणपति स्तवः भगवान गणेश के अत्यंत गहन आध्यात्मिक स्वरूप का वर्णन करता है। इसमें गणेश जी को केवल विघ्नहर्ता या बुद्धि के देवता के रूप में नहीं, बल्कि परब्रह्म के स्वरूप के रूप में भी संबोधित किया गया है।
इस स्तव में भगवान गणेश को अजन्मा, निराकार, निर्गुण, निर्विशेष, सर्वव्यापी और आनंदस्वरूप बताया गया है।
इसका एक विशेष संदेश यह है कि भगवान का साकार रूप भक्त की उपासना का आधार हो सकता है, लेकिन उनका परम स्वरूप सीमित आकार और गुणों से परे माना गया है।
गणपति स्तवः का पाठ कब करें?
भक्त अपनी श्रद्धा के अनुसार इस स्तव का पाठ कर सकते हैं। विशेष रूप से:
बुधवार के दिन
गणेश चतुर्थी के अवसर पर
किसी शुभ कार्य से पहले
प्रातःकाल पूजा के समय
भगवान गणेश की नियमित उपासना में
पाठ करते समय मन को शांत रखकर भगवान गणेश का ध्यान करना और श्लोकों का स्पष्ट उच्चारण करना उचित माना जाता है।
गणपति स्तवः की फलश्रुति
स्तव के अंत में भगवान गणेश स्वयं इसके पाठ का महत्व बताते हैं। उपलब्ध पाठ में कहा गया है कि जो व्यक्ति प्रातःकाल उठकर तथा त्रिसंध्या श्रद्धापूर्वक इसका पाठ करता है, उसे पुत्र, समृद्धि और इच्छित फल की प्राप्ति होती है तथा अंत समय में परब्रह्म स्वरूप की प्राप्ति का वर्णन किया गया है।
फलश्रुति:
इदं यः पठेत्प्रातरुत्थाय धीमान्
त्रिसन्ध्यं सदा भक्तियुक्तो विशुद्धः ।
सपुत्रान् श्रियं सर्वकामान् लभेत
परब्रह्मरूपो भवेदन्तकाले ॥
निष्कर्ष
श्री गणपति स्तवः भगवान गणेश की ऐसी स्तुति है जिसमें उनके साकार और निराकार—दोनों आध्यात्मिक पक्षों का सुंदर वर्णन मिलता है। इसका मूल भाव है कि भगवान गणेश समस्त जगत के कारण, ज्ञान के आधार और परब्रह्म के स्वरूप हैं।
