Hindu Astha

6/recent/ticker-posts

Header Ads Widget

​विजय, समृद्धि और आरोग्य का महापर्व: विजयादशमी


 विशेष आलेख

लेखक: पंकज ओझा (धर्मध्वजारक्षक)

​भारतीय जनमानस और सनातन संस्कृति में त्योहार केवल तिथियों के बदलाव नहीं, बल्कि जीवन को सकारात्मक ऊर्जा, नए उत्साह और आत्म-समीक्षा से भरने के अवसर हैं। आश्विन माह के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को मनाया जाने वाला विजयादशमी यानी दशहरा एक ऐसा ही पावन पर्व है, जो सत्य की असत्य पर और धर्म की अधर्म पर शाश्वत विजय का शंखनाद करता है। यह पर्व केवल ऐतिहासिक या पौराणिक घटनाओं का स्मरण नहीं है, बल्कि यह हमारे शारीरिक, मानसिक और आर्थिक जीवन में सकारात्मक बदलाव लाने का एक दिव्य द्वार भी है।

​विजयादशमी का महत्व और प्रभाव

​दशहरा शब्द दो संस्कृत शब्दों—'दश' (दस) और 'हरा' (हार)—से मिलकर बना है, जिसका अर्थ है दस विकारों या बुराइयों का अंत। ज्योतिषीय और व्यावहारिक दृष्टि से यह दिन 'अबूझ मुहूर्त' (सिद्ध मुहूर्त) माना जाता है। इस दिन शुरू किया गया कोई भी शुभ कार्य, व्यापार या नया संकल्प कभी निष्फल नहीं जाता।

​सामाजिक प्रभाव: यह पर्व समाज में भाईचारे, एकता और अन्याय के खिलाफ एकजुट होने का संदेश देता है।

​मानसिक प्रभाव: रावण के दस सिर वास्तव में मनुष्य के भीतर की दस बुराइयों—काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर (ईर्ष्या), अहंकार, आलस्य, हिंसा और संशय—का प्रतीक हैं। रावण दहन का वास्तविक प्रभाव तब होता है, जब हम अपने भीतर की इन दस बुराइयों को जलाकर नए विवेक का बीजारोपण करते हैं।

​क्यों मनाते हैं दशहरा? पौराणिक मान्यताएं

​विजयादशमी के पीछे दो मुख्य और प्रामाणिक पौराणिक कथाएं जुड़ी हैं:

​श्री राम की रावण पर विजय:

त्रेतायुग में इसी पावन तिथि को मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम ने लंकापति रावण का वध करके माता सीता को मुक्त कराया था और जगत् में धर्म की स्थापना की थी। युद्ध से पूर्व श्री राम ने नौ दिनों तक मां शक्ति की आराधना की थी, जिसके परिणामस्वरूप दसवें दिन उन्हें विजय प्राप्त हुई।

​मां दुर्गा द्वारा महिषासुर वध:

एक अन्य पौराणिक मान्यता के अनुसार, महिषासुर नामक असुर के अत्याचारों से देवलोक और भूलोक को मुक्त कराने के लिए मां दुर्गा ने नौ दिनों तक विकट युद्ध किया था। दसवें दिन (विजयादशमी) मां भगवती ने महिषासुर का संहार किया। इसीलिए यह दिन 'विजयादशमी' कहलाता है।

​रावण दहन का शास्त्रोक्त समय

​शास्त्रों के अनुसार विजयादशमी के दिन रावण दहन के लिए सबसे शुभ और प्रामाणिक काल 'प्रदोष काल' (सूर्यास्त के ठीक बाद का समय) माना जाता है।

​प्रदोष काल: सूर्यास्त के पश्चात जब आकाश में तारे दिखने लगें और गोधूलि बेला समाप्त हो (शाम 05:45 से रात्रि 08:30 बजे के बीच), तब रावण दहन करना अत्यंत शुभ और शास्त्रीय रूप से सही माना गया है।

​विजय मुहूर्त: दोपहर के बाद (लगभग 01:59 PM से 02:45 PM) का 'विजय मुहूर्त' किसी भी नए कार्य की शुरुआत, शस्त्र पूजन और विजय यात्रा के लिए अबूझ मुहूर्त माना जाता है।

​स्वास्थ्य, समृद्धि और सौभाग्य के विशेष प्रयोग व टोटके

​विजयादशमी की तिथि को शास्त्रों में सिद्ध मुहूर्त माना गया है। इस दिन किए गए कुछ पारंपरिक उपाय और प्रयोग जीवन से नकारात्मकता को दूर कर आरोग्य और समृद्धि लाते हैं:

​आरोग्य और स्वास्थ्य सुधार के प्रयोग:

​नीम और शमी का सेवन: विजयादशमी की सुबह नीम के पत्तों और गुड़ का सेवन करने से साल भर मौसमी बीमारियों और शारीरिक विकारों से रक्षा होती है।

​अपराजिता पूजन: इस दिन नीले रंग के अपराजिता के पौधे की पूजा करने से दीर्घायु, मानसिक शांति और निरोगी काया का आशीर्वाद मिलता है।

​रावण दहन की राख: रावण दहन के बाद बची राख (भस्म) को घर लाकर बाहर छिड़कने से नकारात्मक ऊर्जा और बीमारियां दूर रहती हैं।

​समृद्धि और धन-धान्य वृद्धि के प्रयोग:

​शमी वृक्ष का पूजन और सोना बांटना: दशहरे के दिन शमी (खेजड़ी) के पेड़ की पूजा का विशेष विधान है। इस दिन शमी पत्र (पत्तियां) एक-दूसरे को 'सोने' के प्रतीक के रूप में भेंट की जाती हैं। घर की तिजोरी में शमी के पत्ते रखने से धन में निरंतर वृद्धि होती है।

​नीलकंठ पक्षी का दर्शन: दशहरे पर नीलकंठ पक्षी के दर्शन होना अत्यंत शुभ माना जाता है। मान्यता है कि नीलकंठ का दर्शन भाग्य के बंद दरवाजे खोल देता है।

​झाड़ू का उपाय: इस दिन शाम के समय मां लक्ष्मी का ध्यान करते हुए मंदिर में या किसी गरीब को नई झाड़ू दान करने से घर की दरिद्रता का नाश होता है।

​अस्त्र-शस्त्र और वाहन/बहीखाता पूजन: इस दिन व्यापारी अपने बहीखातों, कलम और उपकरणों की पूजा करते हैं, वहीं आम लोग अपने वाहनों व उपकरणों का पूजन कर सुरक्षा और समृद्धि का वरदान मांगते हैं।

​विजयादशमी की महत्ता: जीवन दर्शन

​विजयादशमी केवल पुतले जलाने का उत्सव नहीं, बल्कि स्वयं के भीतर के रावण को पहचानने और उसका अंत करने का संकल्प दिवस है। यदि हम रावण का पुतला जलाते हैं, लेकिन अपने भीतर अहंकार, ईर्ष्या और लोभ को जीवित रखते हैं, तो यह पर्व अधूरा रह जाता है।

​यह पर्व हमें सिखाता है कि बुराई चाहे कितनी भी बलवान या दस सिर वाली क्यों न हो, सत्य और धर्म के एक तीर के सामने उसका ढह जाना तय है।


आइए, इस विजयादशमी पर हम न केवल रावण दहन का साक्षी बनें, बल्कि अपने भीतर के दोषों की आहुति देकर आरोग्य, सद्भाव और समृद्धि के नए युग की शुरुआत करें।

​

आप सभी को विजयादशमी की हार्दिक शुभकामनाएं! पावन पर्व है, जो सत्य की असत्य पर और धर्म की अधर्म पर शाश्वत विजय का शंखनाद करता है। यह पर्व केवल ऐतिहासिक या पौराणिक घटनाओं का स्मरण नहीं है, बल्कि यह हमारे शारीरिक, मानसिक और आर्थिक जीवन में सकारात्मक बदलाव लाने का एक दिव्य द्वार भी है।