धनतेरस : सोना-चाँदी खरीदने का नहीं, आरोग्य, आयुर्वेद और जीवन की अमूल्य संपदा का सनातन महापर्व
बाजार की चकाचौंध में कहीं खो न जाए भगवान धन्वंतरि का संदेश—स्वस्थ शरीर ही सबसे बड़ा धन, निरोगी जीवन ही वास्तविक समृद्धि
लेखक : पंकज ओझा, RAS
धर्मध्वजा रक्षक
भारतीय सनातन धर्म और संस्कृति में प्रत्येक पर्व के पीछे गहरा आध्यात्मिक, दार्शनिक, वैज्ञानिक, सामाजिक और सांस्कृतिक संदेश निहित है। दीपावली महापर्व का शुभारंभ धनतेरस अर्थात् धनत्रयोदशी से होता है। आज सामान्य जनमानस में धनतेरस का अर्थ सोना, चाँदी, आभूषण, वाहन और नए बर्तन खरीदने के दिन तक सीमित होता जा रहा है। बाजारों में खरीदारी की होड़, विज्ञापनों की चकाचौंध और उपभोक्तावादी प्रचार के बीच इस पर्व का मूल आध्यात्मिक संदेश कहीं पीछे छूटता दिखाई देता है।
जबकि भारतीय सनातन परंपरा में धनतेरस भगवान धन्वंतरि के प्राकट्य, आयुर्वेद, आरोग्य, दीर्घायु, जीवन-संरक्षण, यमदीपदान तथा धर्मसम्मत समृद्धि का पावन उत्सव है।
धनतेरस हमें स्मरण कराती है कि संसार की सबसे बड़ी संपत्ति सोना-चाँदी नहीं, बल्कि स्वस्थ शरीर, प्रसन्न मन, संतुलित जीवन, उत्तम विचार और दीर्घायु है। धनवान होकर भी अस्वस्थ व्यक्ति सुखों का पूर्ण आनंद नहीं ले सकता, जबकि स्वस्थ और संतोषी व्यक्ति सीमित साधनों में भी आनंदमय जीवन व्यतीत कर सकता है।
धनतेरस का अर्थ और इसकी शुरुआत कब हुई?
धनतेरस का शाब्दिक अर्थ है—धनत्रयोदशी। यह पर्व उत्तर भारतीय पंचांग के अनुसार कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि को मनाया जाता है।
धनतेरस के प्रथम आयोजन की कोई प्रमाणित ऐतिहासिक तिथि उपलब्ध नहीं है। इसकी धार्मिक परंपरा भगवान धन्वंतरि के प्राकट्य, समुद्र मंथन तथा यमदीपदान से जुड़ी हुई है।
सनातन परंपरा में धन का अर्थ केवल मुद्रा, स्वर्ण या भौतिक संपत्ति नहीं है। आरोग्य, आयु, ज्ञान, अन्न, परिवार, सदाचार, संतोष और मानसिक शांति भी जीवन की महत्वपूर्ण संपदाएँ हैं।
धनतेरस इन्हीं बहुआयामी संपदाओं के संरक्षण और संवर्धन की प्रेरणा देती है।
समुद्र मंथन और भगवान धन्वंतरि का प्राकट्य
श्रीमद्भागवत महापुराण के अष्टम स्कंध में समुद्र मंथन का विस्तृत वर्णन मिलता है। पौराणिक कथा के अनुसार देवताओं और असुरों ने अमृत प्राप्ति के लिए क्षीरसागर का मंथन किया। मंदराचल पर्वत को मथानी तथा वासुकि नाग को रस्सी बनाकर समुद्र मंथन किया गया।
समुद्र मंथन से अनेक दिव्य रत्नों और विभूतियों के साथ भगवान धन्वंतरि का प्राकट्य हुआ। उनके हाथों में अमृत से भरा कलश था।
भगवान धन्वंतरि को भगवान विष्णु का अंशावतार तथा देवताओं का वैद्य माना जाता है। उनके प्राकट्य का संदेश है कि जीवन में अमृततुल्य संपदा आरोग्य और जीवन की रक्षा है।
पौराणिक परंपरा में धन्वंतरि के प्राकट्य को धनत्रयोदशी से जोड़ा जाता है। इसी कारण यह दिन धन्वंतरि जयंती के रूप में मनाया जाता है।
भगवान धन्वंतरि : आयुर्वेद और चिकित्सा के आराध्य देवता
भगवान धन्वंतरि का महत्व केवल एक पौराणिक चरित्र के रूप में नहीं, बल्कि भारतीय चिकित्सा परंपरा के आराध्य देवता के रूप में भी है।
सुश्रुत संहिता के सूत्रस्थान के प्रथम अध्याय में काशी के राजा दिवोदास धन्वंतरि द्वारा चिकित्सा ज्ञान प्रदान करने का उल्लेख मिलता है। इस परंपरा में महर्षि सुश्रुत को शल्यचिकित्सा के महान आचार्य के रूप में प्रतिष्ठा प्राप्त है।
धन्वंतरि की परंपरा हमें बताती है कि चिकित्सा केवल रोगों के उपचार का माध्यम नहीं, बल्कि मानव जीवन की रक्षा, पीड़ा के निवारण और लोककल्याण का पवित्र दायित्व भी है।
इसलिए धनतेरस चिकित्सकों, वैद्यों, स्वास्थ्यकर्मियों और समस्त समाज के लिए विशेष प्रेरणादायक पर्व है।
वेद, उपनिषद और आयुर्वेद में आरोग्य का महत्व
भारतीय ज्ञान परंपरा में स्वास्थ्य को जीवन का आधार माना गया है। अथर्ववेद में औषधियों, दीर्घायु, रोगनिवारण और जीवन-संरक्षण से संबंधित अनेक मंत्र मिलते हैं।
ईशावास्य उपनिषद् का प्रसिद्ध मंत्र है—
कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः।
अर्थात् मनुष्य कर्म करते हुए सौ वर्ष तक जीने की अभिलाषा रखे।
यह मंत्र सक्रिय, कर्तव्यनिष्ठ और सार्थक जीवन का संदेश देता है।
आयुर्वेद के महान ग्रंथ चरक संहिता में स्वास्थ्य संरक्षण और रोगोपचार का उद्देश्य अत्यंत स्पष्ट रूप से व्यक्त किया गया है—
स्वस्थस्य स्वास्थ्यरक्षणम्, आतुरस्य विकारप्रशमनं च।
अर्थात् स्वस्थ व्यक्ति के स्वास्थ्य की रक्षा करना तथा रोगग्रस्त व्यक्ति के विकारों को दूर करना आयुर्वेद का प्रमुख प्रयोजन है।
इसी प्रकार भारतीय शास्त्रीय साहित्य में प्रसिद्ध उक्ति है—
शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम्।
अर्थात् शरीर ही धर्म और कर्तव्य के पालन का प्रथम साधन है।
यह उक्ति महाकवि कालिदास के कुमारसम्भव से संबंधित है और भारतीय जीवनदर्शन में स्वास्थ्य की महत्ता को प्रकट करती है।
इन सभी विचारों का सार यही है कि स्वस्थ शरीर के बिना धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के पुरुषार्थों की साधना कठिन हो जाती है।
धनतेरस और यमदीपदान : अकाल मृत्यु के भय से मुक्ति की प्रार्थना
धनतेरस की एक महत्वपूर्ण धार्मिक परंपरा यमदीपदान है।
स्कन्दपुराण की कार्तिक माहात्म्य परंपरा में त्रयोदशी की संध्या पर यमराज के निमित्त दीपदान का महत्व बताया गया है।
एक प्रचलित लोककथा के अनुसार राजा हेम के पुत्र की अल्पायु का योग बताया गया था। विवाह के बाद उसकी पत्नी ने निर्धारित रात्रि में घर के द्वार पर दीपक जलाए, आभूषण और स्वर्ण मुद्राएँ रखीं तथा पूरी रात जागरण किया। लोककथा के अनुसार इस उपाय से राजकुमार की अकाल मृत्यु टल गई।
इस कथा के विभिन्न क्षेत्रीय रूप प्रचलित हैं। इसका मुख्य संदेश जीवन की रक्षा, जागरूकता, साहस और मृत्यु के भय से मुक्ति की प्रार्थना है।
धनतेरस की संध्या पर यमराज के निमित्त घर के मुख्य द्वार के बाहर दक्षिण दिशा की ओर दीपक जलाने की परंपरा है। अनेक परिवारों में तेरह दीपक जलाने की भी प्रथा है।
इस धार्मिक अनुष्ठान को अकाल मृत्यु से रक्षा की प्रार्थना का प्रतीक माना जाता है। यह चिकित्सा अथवा दुर्घटना से सुरक्षा का वैज्ञानिक विकल्प नहीं है।
धनतेरस पर किन देवताओं की पूजा की जाती है?
धनतेरस पर प्रमुख रूप से भगवान धन्वंतरि की आराधना की जाती है। उनके साथ माता महालक्ष्मी, भगवान कुबेर तथा यमराज का भी धार्मिक परंपराओं के अनुसार स्मरण एवं पूजन किया जाता है।
भगवान धन्वंतरि — उत्तम स्वास्थ्य, रोगनिवारण और दीर्घायु के आराध्य।
माता महालक्ष्मी — सुख, सौभाग्य, समृद्धि और ऐश्वर्य की अधिष्ठात्री देवी।
भगवान कुबेर — धन-संपदा के संरक्षण और धर्मसम्मत समृद्धि के प्रतीक।
धर्मराज यम — जीवन की नश्वरता, धर्म, न्याय और मृत्यु के प्रति जागरूकता के प्रतीक।
इस प्रकार धनतेरस केवल धन प्राप्ति का नहीं, बल्कि स्वास्थ्य, जीवन-सुरक्षा, सदाचार और संतुलित समृद्धि का उत्सव है।
धनतेरस पर सोना-चाँदी और बर्तन खरीदने की परंपरा का वास्तविक अर्थ
धनतेरस पर धातु के बर्तन, चाँदी के सिक्के तथा अन्य उपयोगी वस्तुएँ खरीदने की परंपरा लंबे समय से प्रचलित है।
नए बर्तन को घर की समृद्धि, अन्नपूर्णता और शुभारंभ का प्रतीक माना जाता है। चाँदी और अन्य धातुओं की खरीद को भी अनेक परिवार शुभ मानते हैं।
किंतु यह समझना आवश्यक है कि भगवान धन्वंतरि के प्राकट्य का पौराणिक वर्णन और सोना-चाँदी खरीदने की लोकपरंपरा एक ही बात नहीं हैं। प्रमुख पौराणिक कथाओं में धनतेरस पर प्रत्येक व्यक्ति के लिए सोना-चाँदी खरीदना अनिवार्य धार्मिक कर्तव्य नहीं बताया गया है।
आज व्यापारिक प्रतिष्ठानों, आभूषण विक्रेताओं, बड़े बाजारों तथा विज्ञापन-प्रधान प्रचार ने इस पर्व के खरीदारी पक्ष को अत्यधिक प्रमुखता दे दी है।
समाचार-पत्रों, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया और डिजिटल माध्यमों में धनतेरस को कई बार खरीदारी के उत्सव के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, जबकि भगवान धन्वंतरि, आयुर्वेद, स्वास्थ्य संरक्षण और यमदीपदान का महत्व अपेक्षाकृत कम चर्चा में आता है।
व्यापार करना अथवा सामर्थ्यानुसार खरीदारी करना अनुचित नहीं है। इससे व्यापारियों, कारीगरों, कुम्हारों और अनेक परिवारों की आजीविका भी जुड़ी हुई है। समस्या तब उत्पन्न होती है जब खरीदारी को ही धर्म का पर्याय बना दिया जाता है और आर्थिक सामर्थ्य से अधिक खर्च करने का सामाजिक दबाव उत्पन्न होता है।
सनातन संस्कृति का संदेश दिखावे और अनावश्यक उपभोग का नहीं, बल्कि संयम, संतुलन, सदाचार और लोककल्याण का है।
धनतेरस पर शास्त्रीय भावना के अनुरूप क्या करना चाहिए?
धनतेरस को वास्तविक अर्थों में आरोग्य और समृद्धि का पर्व बनाने के लिए कुछ महत्वपूर्ण संकल्प लिए जा सकते हैं।
1. भगवान धन्वंतरि का पूजन करें। भगवान धन्वंतरि की प्रतिमा अथवा चित्र के समक्ष दीपक जलाकर उत्तम स्वास्थ्य, दीर्घायु और समस्त प्राणियों के कल्याण की प्रार्थना करें।
2. अपने स्वास्थ्य का परीक्षण कराएँ। अपनी आयु और स्वास्थ्य-स्थिति के अनुसार चिकित्सकीय परामर्श से रक्तचाप, रक्त शर्करा तथा अन्य आवश्यक जाँच कराएँ। परिवार के बुजुर्गों के स्वास्थ्य पर विशेष ध्यान दें।
3. संतुलित भोजन का संकल्प लें। पौष्टिक आहार, स्वच्छ जल, उचित दिनचर्या तथा मौसमी फल-सब्जियों को जीवन में स्थान दें।
4. योग, प्राणायाम और व्यायाम अपनाएँ। अपनी शारीरिक क्षमता के अनुसार नियमित योग, ध्यान, प्राणायाम अथवा पैदल चलने का अभ्यास करें।
5. नशामुक्त और संयमित जीवन अपनाएँ। तंबाकू, धूम्रपान और अन्य हानिकारक आदतों से दूर रहने का संकल्प लें।
6. जरूरतमंदों की सेवा करें। निर्धन एवं असहाय व्यक्तियों को भोजन, वस्त्र, आवश्यक दवाएँ अथवा चिकित्सा सहायता प्रदान करें।
7. औषधीय पौधों का संरक्षण करें। तुलसी, नीम, आँवला, गिलोय तथा अन्य उपयोगी पौधों के संरक्षण और पर्यावरण की स्वच्छता का संकल्प लें। किसी भी औषधि का सेवन चिकित्सकीय सलाह के अनुसार ही करें।
8. परिवार के स्वास्थ्य को प्राथमिकता दें। धनतेरस पर केवल आभूषण खरीदने के बजाय परिवार के स्वास्थ्य, पोषण, उपचार और आवश्यक स्वास्थ्य सुरक्षा पर भी व्यय करने की प्रेरणा लें।
यही भगवान धन्वंतरि की आराधना को दैनिक जीवन के आचरण में उतारने का सार्थक प्रयास होगा।
धनतेरस पर दीपदान एवं पूजन की सरल विधि
धनतेरस के दिन प्रातः स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें। पूजास्थल को स्वच्छ करके भगवान धन्वंतरि का चित्र अथवा प्रतिमा स्थापित करें।
भगवान धन्वंतरि को पुष्प, अक्षत, चंदन, धूप, दीप, फल और नैवेद्य अर्पित करें। अपने तथा परिवार के उत्तम स्वास्थ्य और दीर्घायु की प्रार्थना करें।
भगवान धन्वंतरि के स्मरण हेतु प्रचलित सरल मंत्र है—
ॐ धन्वंतरये नमः॥
श्रद्धानुसार इस मंत्र का 11, 21 अथवा 108 बार जप किया जा सकता है।
सायंकाल प्रदोष काल में परिवार की परंपरा के अनुसार माता लक्ष्मी एवं भगवान कुबेर का पूजन करें।
यमदीपदान के लिए मिट्टी का दीपक लेकर उसमें तिल अथवा सरसों का तेल और रुई की बत्ती रखें। दीपक को घर के मुख्य द्वार के बाहर सुरक्षित स्थान पर दक्षिण दिशा की ओर रखकर धर्मराज यम का स्मरण करें।
ध्यान रखें कि दीपक पर्दों, ज्वलनशील वस्तुओं तथा बच्चों की पहुँच से सुरक्षित दूरी पर हो।
धनतेरस : आरोग्य की परंपरा को पुनर्जीवित करने का अवसर
भारत सरकार ने वर्ष 2016 से भगवान धन्वंतरि जयंती के अवसर पर राष्ट्रीय आयुर्वेद दिवस मनाने की शुरुआत की थी। बाद में वर्ष 2025 से आयुर्वेद दिवस की आधिकारिक तिथि प्रतिवर्ष 23 सितंबर निर्धारित कर दी गई। यद्यपि सरकारी आयोजन की तिथि बदल गई है, धनतेरस का पारंपरिक धन्वंतरि जयंती और आरोग्य से संबंध यथावत है।
यह तथ्य भी दर्शाता है कि धनतेरस की पहचान भारतीय चिकित्सा और स्वास्थ्य परंपरा से गहराई से जुड़ी हुई है।
आज आवश्यकता है कि विद्यालयों, महाविद्यालयों, सामाजिक संस्थाओं, चिकित्सालयों, मंदिरों और धार्मिक संगठनों में धनतेरस के अवसर पर स्वास्थ्य जागरूकता, आयुर्वेद परिचर्चा, निःशुल्क चिकित्सा जाँच, योग प्रशिक्षण तथा स्वास्थ्य सेवा के कार्यक्रम आयोजित किए जाएँ।
समाचार-पत्र और मीडिया भी इस पर्व के वास्तविक आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक महत्व को समाज तक पहुँचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
धनतेरस का वास्तविक संदेश : पहले आरोग्य, फिर ऐश्वर्य
धनतेरस हमें यह समझाती है कि जीवन में धन आवश्यक है, लेकिन धन से भी अधिक महत्वपूर्ण है उसका सदुपयोग करने वाला स्वस्थ शरीर और विवेकशील मन।
यदि शरीर रोगग्रस्त है, मन अशांत है और जीवन में संतोष नहीं है, तो अपार धन-संपदा भी पूर्ण सुख नहीं दे सकती।
इसके विपरीत स्वस्थ शरीर, शांत मन, सदाचारी जीवन, संतुलित आवश्यकताएँ और परिवार का प्रेम मनुष्य को वास्तविक समृद्धि प्रदान करते हैं।
भगवान धन्वंतरि के हाथों में अमृत कलश हमें जीवन-संरक्षण का संदेश देता है, माता लक्ष्मी धर्मसम्मत समृद्धि की प्रेरणा देती हैं और यमदीपदान जीवन की नश्वरता का स्मरण कराता है।
आइए, इस धनतेरस पर केवल सोना-चाँदी और बर्तन खरीदने की परंपरा तक सीमित न रहकर अपने जीवन में आरोग्य, संयम, सेवा, सदाचार, संतोष और आत्मिक आनंद का संकल्प लें।
धनतेरस पर सबसे बड़ी खरीदारी स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता हो, सबसे बड़ा निवेश परिवार का आरोग्य हो और सबसे बड़ी कमाई जीवन का सुख, संतोष और आनंद हो।
क्योंकि सोना-चाँदी तिजोरी की संपत्ति है, लेकिन निरोगी काया जीवन की वास्तविक संपत्ति है।
स्वस्थ तन, प्रसन्न मन, सात्त्विक जीवन और संतुष्ट आत्मा—यही सनातन संस्कृति की सच्ची धनतेरस है।
सर्वे भवन्तु सुखिनः।
सर्वे सन्तु निरामयाः।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु।
मा कश्चिद्दुःखभाग्भवेत्॥
अर्थात् सभी सुखी हों, सभी निरोगी हों, सभी का कल्याण हो और कोई भी दुःख का भागी न बने।
आप सभी को भगवान धन्वंतरि जयंती एवं धनतेरस के पावन पर्व की हार्दिक शुभकामनाएँ।
पंकज ओझा, RAS
धर्मध्वजा रक्षक
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लेख के प्रमुख शास्त्रीय एवं प्रामाणिक संदर्भ
श्रीमद्भागवत महापुराण,ख के प्रमुख शास्त्रीय एवं प्रामाणिक संदर्भ
श्रीमद्भागवत महापुराण, अष्टम स्कंध, अध्याय 8 — समुद्र मंथन और भगवान धन्वंतरि का प्राकट्य।
सुश्रुत संहिता, सूत्रस्थान, अध्याय 1 — दिवोदास धन्वंतरि और चिकित्सा ज्ञान की परंपरा।
स्कन्दपुराण, कार्तिक माहात्म्य — यमदीपदान की धार्मिक परंपरा।
आयुष मंत्रालय, भारत सरकार — धन्वंतरि जयंती से आयुर्वेद दिवस का संबंध तथा वर्ष 2025 से 23 सितंबर की निर्धारित तिथि। अष्टम स्कंध, अध्याय 8 — समुद्र मंथन और भगवान धन्वंतरि का प्राकट्य।
सुश्रुत संहिता, सूत्रस्थान, अध्याय 1 — दिवोदास धन्वंतरि और चिकित्सा ज्ञान की परंपरा।
स्कन्दपुराण, कार्तिक माहात्म्य — यमदीपदान की धार्मिक परंपरा।
आयुष मंत्रालय, भारत सरकार — धन्वंतरि जयंती से आयुर्वेद दिवस का संबंध तथा वर्ष 2025 से 23 सितंबर की निर्धारित तिथि।
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