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| पंडित अशोक चतुर्वेदी |
होली के रंगों से पहले एक ऐसा समय आता है जिसे हिंदू धर्म में विशेष माना जाता है — इसे Holastak कहा जाता है। होलाष्टक, फाल्गुन शुक्ल पक्ष की अष्टमी से शुरू होकर होली दहन तक के आठ दिनों की अवधि होती है। मान्यता है कि इन दिनों में शुभ और मांगलिक कार्य नहीं किए जाते। लेकिन आखिर क्यों? आइए जानते हैं इसकी पौराणिक कथा, धार्मिक महत्व और परंपराएं।
होलाष्टक 2026 में 24 फरवरी मंगलवार से शुरू
पौराणिक कथा से जुड़ा है होलाष्टक
होलाष्टक की कथा का संबंध भक्त Prahlada और उसके पिता असुर राजा Hiranyakashipu से जुड़ा है।
कथा के अनुसार, हिरण्यकशिपु अत्यंत शक्तिशाली और अहंकारी राजा था। उसने अपने राज्य में आदेश दिया था कि सभी लोग उसकी ही पूजा करें। लेकिन उसका पुत्र प्रह्लाद भगवान विष्णु का परम भक्त था। पिता के विरोध के बावजूद वह विष्णु भक्ति में लीन रहता था।
इससे क्रोधित होकर हिरण्यकशिपु ने प्रह्लाद को कई कठोर यातनाएं दीं। अंततः उसने अपनी बहन Holika को बुलाया, जिसे अग्नि से न जलने का वरदान प्राप्त था। योजना के अनुसार, होलिका प्रह्लाद को गोद में लेकर अग्नि में बैठ गई। किंतु भगवान की कृपा से प्रह्लाद सुरक्षित बच गए और होलिका जलकर भस्म हो गई।
इसी घटना की स्मृति में होली से एक दिन पहले होलिका दहन किया जाता है। मान्यता है कि होलाष्टक के इन आठ दिनों में प्रह्लाद को अत्याचार सहने पड़े थे, इसलिए यह समय कष्ट और अशांति का प्रतीक माना जाता है।
क्यों नहीं किए जाते शुभ कार्य?
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार होलाष्टक के दौरान ग्रहों की स्थिति उग्र मानी जाती है। ज्योतिष शास्त्र में कहा गया है कि इस अवधि में विवाह, गृह प्रवेश, नामकरण, मुंडन जैसे मांगलिक कार्य करने से बचना चाहिए।
हालांकि, यह परंपरा आस्था और मान्यता पर आधारित है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से इन दिनों को अशुभ मानने का कोई प्रमाण उपलब्ध नहीं है। कई लोग इस समय को साधना, भजन-कीर्तन और आत्मचिंतन के लिए उपयुक्त मानते हैं।
होलाष्टक का धार्मिक और सामाजिक महत्व
होलाष्टक केवल अशुभता का प्रतीक नहीं है, बल्कि यह हमें यह भी सिखाता है कि सत्य और भक्ति की हमेशा विजय होती है। प्रह्लाद की अटूट श्रद्धा और आस्था का संदेश आज भी लोगों को प्रेरित करता है।
इन आठ दिनों के बाद जब होलिका दहन होता है, तो यह बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक बन जाता है। इसके अगले दिन रंगों की होली के साथ खुशियां और उल्लास का वातावरण बनता है।
होलाष्टक भारतीय संस्कृति और परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा है। यह समय संयम, भक्ति और आत्मचिंतन का संदेश देता है। चाहे इसे धार्मिक मान्यता के रूप में देखा जाए या सांस्कृतिक परंपरा के रूप में, होलाष्टक का महत्व होली के उत्सव को और भी गहरा बना देता है।
