. होली पर चन्द्र ग्रहण
राजस्थान और गुजरात के पश्चिमी सीमान्त जैसलमेर, बाड़मेर, जूनागढ़, जामनगर आदि क्षेत्रों को छोड़कर सम्पूर्ण भारत में 3 मार्च मंगलवार को चन्द्र ग्रहण होगा।
यह ग्रहण होलिका दहन से अगले दिन फाल्गुनी पूर्णिमा को भारत से पूर्वी देशों में 15.20 बजे से प्रारम्भ होता हुआ सायं सूर्यास्त के बाद 6.47 बजे समाप्त होगा।
अर्थात् जिन देशों में भारतीय मानक समय 15.20 बजे से 18.47 बजे के मध्य चन्द्रोदय होगा उन देशों में चन्द्रग्रहण दिखाई देगा और उसका शुभाशुभ फल भी प्रभावी होगा।
मंगलवार को सायं सूर्यास्त के बाद ग्रस्तोदित चन्द्रमा अर्थात् ग्रहण लगा हुआ चन्द्रमा उदित होगा और सायं 6.47 बजे एकदम शुद्ध हो जाएगा।
जहां भी चन्द्रोदय 5.33 से पूर्व होगा वहां खग्रास अर्थात् पूर्ण चंद्रग्रहण दिखाई देगा और जहां 5.33 के बाद चन्द्रोदय होगा वहां शुद्ध होता खण्डग्रास चन्द्रग्रहण दिखाई देगा।
यह ग्रहण सुदूर पूर्वी अरुणाचलप्रदेश असम आदि में खग्रास होगा अन्य स्थानों पर खण्डग्रास दिखाई देगा।
देशान्तर मान के अनुसार सभी स्थानों का सूर्योदय एवं सूर्यास्त भिन्न भिन्न होते है।
एक देशान्तर से दूसरे देशान्तर पर सूर्योदय चार मिनट बाद होता है। कुल देशान्तर 360 हैं। 360 × 4 = 1440 मिनट अर्थात् 24 घंटे सूर्योदय होता प्रतीत होता है।
ग्रहण का सूतक-
सामान्यत: चन्द्रग्रहण का सूतक ग्रहण दिखाई देने से तीन प्रहर अर्थात् नौ घंटे पहले प्रारम्भ होता है और सूर्य ग्रहण का सूतक ग्रहण लगने से चार प्रहर अर्थात् 12 घंटे पहले प्रारम्भ हो जाता है।
जब चन्द्रमा ग्रस्तोदित होता है तो सूतक चार प्रहर (12 घंटे) पहले प्रारम्भ हो जाता है।
या यों कहें कि सूर्योदय के साथ ही सूतक लग जाता है। कतिपय शास्त्रज्ञ तो पूर्व दिन की संध्या काल से ही अन्नादिक ग्रहण का दोष लिखते हैं। तो कुछ अरुणोदय काल से मानते हैं।
हमारे यहां 03 मार्च 2026 मंगलवार को फाल्गुनी पूर्णिमा पर ऐसा ही ग्रस्तोदित चन्द्र ग्रहण दिखाई देगा, अतः 12 घंटे पहले ही सूतक प्रारम्भ हो जाएगा।
होलिका दहन -
होलिका दहन किस दिन और किस समय पर हो इसको लेकर पंचांग कर्ताओं ने चार प्रकार के निर्णय दिए हैं। चार-चार निर्णयों से धर्मिष्ठ लोग भ्रमित हो रहे हैं।-
1. होलिका दहन 2 मार्च को सूर्यास्त बाद प्रदोषकाल में।
- यह निर्णय पूर्णतया अशुद्ध एवं अशास्त्रीय है।
2. मध्य रात्रि बाद भद्रा पुच्छ काल में।
-पूर्णतया शास्त्रीय निर्णय है।
3. सूर्योदय से पूर्व भद्रा समाप्ति के बाद।
-जहां भद्रा 56 घटी से न्यून है, वहां सर्वथा शुद्ध है। अन्यत्र नहीं। क्योंकि 56 घटी के बाद अरुणोदय काल प्रारम्भ हो जाता है। अरुणोदय का होलिका दहन में निषेध है। कतिपय विद्वान् 58 घटी पूर्व को ग्रहण करते हैं।
4. या तीन मार्च को सायं प्रदोषकाल में हो।
-तीन मार्च को प्रदोषकाल में प्रतिपदा व्याप्त है जो पूर्णतः गौणकाल होने से त्याज्य है।
शास्त्र सम्मत निर्णय एक ही होना चाहिए। अतः दो मार्च की रात भद्रा पुच्छ काल ही होलिका दहन के लिए श्रेयस्कर है।
नीमकाथाना राजस्थान में भद्रा पुच्छ काल निशीथ काल के पश्चात् 01.27 से 02.38 तक है। इस समयावधि में होलिका दहन करना सर्वथा शुद्ध है।
ग्रस्त रहता हुआ चन्द्रग्रहण सूर्योदय बाद तक भी चल रहा होता है तो ग्रस्तास्त ग्रहण कहलाता है। उसका शुद्धिकरण सायं चन्द्र दर्शन बाद ही कहा गया है।
हमारे यहां राहु से ग्रसित चन्द्रमा सायं 6.24 पर दिखाई देगा और ग्रहण शुद्धि ( मोक्ष ) सायं 6.47 बाद होगी। ग्रहण का पर्वकाल मात्र 23 मिनट का है। वैसे पूर्वी देशों में सम्पूर्ण पर्व काल 3.27 मिनट का है।
वैसे होली पर होने वाला यह चन्द्र ग्रहण खग्रास है। फिर भी भारत के अधिकतम भाग में चन्द्र ग्रहण मध्य रूप में दृश्य नहीं होगा क्योंकि चन्द्रमा उदय से पूर्व ही मध्य से मुक्त हो चुका होगा।
जहां सूर्यास्त 5.04 से पहले होगा वहां आकाश में चन्द्रमा काली थाली के समान दिखाई देगा। काली थाली जैसा चन्द्रमा लगभग तीस मिनट रहेगा। 5.33 बाद सूर्यास्त वाले क्षेत्रों में ग्रहण शुद्ध होता हुआ दिखाई देगा।
ग्रहण के दिन नीमकाथाना क्षेत्र में सभी धार्मिक कृत्यों को सूतक लगने से पूर्व प्रातः 6.24 से पहले सम्पन्न कर लें। प्रातः 5.20 अरुणोदय से पहले कर लें तो और भी श्रेयस्कर होगा।
सभी स्थानों पर मन्दिरों में भी सूतक लगने से पहले आरती आदि सम्पन्न कर लेनी चाहिए।
ग्रहण से पूर्व स्नान, मध्य में हवन जपार्चन एवं अन्त में शुद्धिस्नान का विधान है। ग्रहण काल में ही सम्पूर्ण पर्व काल को ही पुण्यकाल कहा गया है। ग्रहण में संक्रान्ति की भांति पूर्व या पश्चात् पुण्य काल नहीं होता है। ग्रहण काल में पुस्तक माला आसन स्पर्श का दोष नहीं होता है।
सायं 6.47 बाद शुद्धिकरण के पश्चात नूतन यज्ञोपवीत धारण कर पूजा अर्चना कर भोजन आदि ग्रहण करें।
ग्रहण के सन्दर्भ में ज्योतिषीय पक्ष-
सूर्यसिद्धांत में कहा है कि -
छादको भास्करस्येन्दुरध:स्थो घनवद्भवेत्।
भूच्छायां प्राङ्मुखश्चन्द्रो विशत्यस्य भवेदसौ।।
वराहसंहिता में कहा है कि -
भूच्छायां स्वग्रहणे (चन्द्रग्रहणे) भास्करमर्कग्रहे च प्रविशतीन्दु:।
ज्योतिषशास्त्र और धर्मशास्त्र में ग्रहण के पृथक् पृथक् कारण कहे हैं।
समस्त भूमण्डल पर एक वर्ष में कम से कम दो और अधिकतम सात ग्रहण लगते हैं।
अंशात्मक अन्तर से अमावस्या के दिन सूर्य-चन्द्रमा से षड्राश्यन्तर राहु होने पर सूर्य ग्रहण और पूर्णिमा के दिन सूर्य से चन्द्र-राहु की षड्राश्यन्तर स्थिति चन्द्रग्रहण बनाती है।
चन्द्रग्रहण में चन्द्रमा पूर्वाभिमुखी गति करता हुआ भूच्छाया में प्रवेश करता है।अतः चन्द्रग्रहण प्रत्येक देश में समान रूप से देखा जाता है।
और सूर्यग्रहण में चन्द्रमा पश्चिम दिशा से आकर बादल के सदृश सूर्यबिम्ब में प्रवेश करता है। अतः सूर्यग्रहण विविध दृष्टिवश प्रत्येक देश में विविध रूपों में दिखाई देता है।
इसीलिए कभी भी चन्द्रग्रहण का स्पर्श पश्चिम दिशा से और सूर्यग्रहण का स्पर्श पूर्व दिशा से नहीं होता है। स्पर्श अर्थात् आरम्भ।
बृहत् संहिता में स्पष्ट कहा है-
भूच्छायां स्वग्रहणे भास्करमर्कग्रहे प्रविशतीन्दु:।
प्रग्रहणमत: पश्चान्नेन्दोर्भानोश्च पूर्वार्द्धात्।।
किसी भी मास में पक्ष भेद अर्थात् एक पखवाड़े के भीतर लगातार दो ग्रहण शुभ नहीं होते हैं।
चन्द्र ग्रहण के बाद सूर्य ग्रहण होना शुभ संकेत नहीं हैं।-
सोमग्रहे निवृत्ते पक्षान्ते यदि भवेद् ग्रहोऽर्कस्य।
तत्रामय: प्रजानां दम्पत्योर्वैमनस्यं जायतेऽन्योन्यम्।।
और सूर्य ग्रहण के पश्चात चन्द्रग्रहण हो तो-
यद्येकस्मिन्मासे ग्रहणं रविसोमयोस्तदा क्षितिपा:
स्वबलक्षोभै: संक्षयमायान्त्यतिशस्त्रकोशञ्च।
अर्कग्रहात्तु शशिनो ग्रहणं यदि दृश्यते ततो विप्रा:
नैकव्रतु फलभाजो भवन्ति मुदिता: प्रजाश्चैव।।
सोमवार को चन्द्र ग्रहण और रविवार को सूर्यग्रहण हो तो चूड़ामणि योग बनता है। चूड़ामणि योग में आने वाले ग्रहण काल में स्नान दान पुण्य का लाखों गुना सुफल प्राप्त होता है।
ग्रहण में सामाजिक व्यवस्था-
सूतके मृतके चैव न दोषो राहुदर्शने।
स्नानमात्रं तु कर्तव्यं दानं श्राद्धविवर्जितम् ।।
और भी-
चन्द्रसूर्यग्रहे यस्तु स्नानं दानं शिवार्चनम्।
न करोतु पितु: श्राद्धं स नर: पतितो भवेत्।।
और भी -
सन्ध्या काले यदा राहु अस्ते शशीभास्करौ।
तदहे नैव भुंजीत रात्रावपि कदाचन।।
और भी देखिए -
सायंसंध्याया: सूर्यग्रहण अस्ते पूर्वेह्नि रात्रौ च न भोक्तव्यम्।
ग्रस्यमाने भवेत्स्नानं ग्रस्ते होमो विधीयते।
मुच्यमाने भवेद्दानं मुक्ते स्नानं विधीयते।।
ग्रहण का स्नान गंगा यमुना संगम में करना श्रेयस्कर है।
सर्वेषामेव वर्णानां सूतकं राहूदर्शने।
सचैलं तु भवेत्स्नानं सूतकान्तं च वर्जयेत्।।
और भी कह रहे हैं -
भुक्तौ यस्तु न कुर्वीत स्नानं ग्रहणसूतके।
स सूतकी भवेत्तावद्यावत्स्यादपरो ग्रह:।।
और भी देखिए -
मृते जन्मनि सङ्क्रान्तौ ग्रहणे चन्द्रसूर्ययो:।
अस्पृश्यस्पर्शने चैव न स्नायादुष्णवारिणा।।
ग्रहण काल के समय अपने इष्टदेव के नाम का या गुरुमंत्र मन्त्र का जप करें।
ग्रहण का शुभाशुभ फल -
सप्ताष्टजन्मशेषेषु चतुर्थे दशमे तथा।
नवमे च तथा चन्द्रे न कुर्याद्राहूदर्शनम्।।
वेध काल (सूतक - शर ) में बाल, वृद्ध, रोगी और गृहस्थ के लिए भोजनादि के नियम अनिवार्य नहीं है। इनकी शुद्धि सूर्य किरणों से और अग्नि मात्र से ही हो जाती है।
सूतक और ग्रहण काल में शयनादि भी निषिद्ध हैं। देव मूर्ति का स्पर्श भी नहीं करना चाहिए।ग्रहण के दिन रात्रि में भी श्राद्ध अवश्य करना चाहिए।
अमान्न- कच्चे अन्न या स्वर्णादि से श्राद्ध करने का विधान है। श्राद्ध व्रत अवश्य ही करना चाहिए। पूजन का निषेध है।
ग्रहण के समय भगवान का चिंतन, जप, ध्यान करने पर उसका लाख गुना फल मिलता है।
ग्रहण के समय सम्भोग करने से सुअर की योनि मिलती है और चाण्डाल सन्तति पैदा होती है।
ग्रहण के समय भोजन करने और तैल लगाने से कुष्ट रोग हो सकता है।
ग्रहण शुद्धि पश्चात् गर्म पानी से स्नान नहीं करें। बच्चे बूढ़े और बीमार गर्म पानी उपयोग में ला सकते हैं।
विशेष सिद्धांत है कि सूर्य ग्रहण अमावस्या और प्रतिपदा की सन्धि में और चंद्रग्रहण पूर्णिमा और प्रतिपदा की सन्धि में ही होते हैं-
पूर्णिमाप्रतिपत्सन्धौ राहु: सम्पूर्णमण्डलम्।
ग्रसते चन्द्रमर्कं च दर्शप्रतिपदन्तरे।।
और भी सरल कर दें ग्रहण का मध्य पूर्णिमा अमावस्या का समाप्ति काल ही होता है।-
पर्वप्रतिपदसन्धौ ग्रहण मध्य:
और भी विशेष -
ग्रहण काल में शवदाह करना और श्राद्ध करना शास्त्र सम्मत है। यथा
1. जिसके घर में मृत्यु का महाग्रहण लग गया है उसे सूर्य ग्रहण या चन्द्र ग्रहण क्या कहेंगे। सूतकी यथा सुविधा शवदाह करने का अधिकारी है।
2. ग्रहण काल में पिता के श्राद्ध का विशेष महत्व कहा है।
3. रात्रि में श्राद्ध का दोष है, निषेध है परन्तु ग्रहण काल की रात्रि में श्राद्ध करने का विशेष महत्व है। विधि शास्त्रोक्त हो।
4. पूर्णिमा और अमावास्या दो तिथियों में ग्रहण आते हैं, दोनों ही श्राद्ध के लिए महत्वपूर्ण हैं। कोई भी जिस किसी विधि से पिता आदि का, विशेष रूप से पिता का श्राद्ध करता है उसे सदा सर्वदा के लिए अक्षय्य पुण्य प्राप्त होता है।
कहा भी है -
स्नानं दानं तप: श्राद्धमनन्तं राहुदर्शने।
राहुदर्शनदत्तं हि श्राद्धमाचन्द्रतारकम्।।
गुणवत्सर्वकामीयं पितॄणामुपतिष्ठते।।
5. लोकाचार में ग्रहणकाल और ग्रहण के सूतक को श्राद्ध के लिए हेय माना जाता है जबकि इनमें किया गया श्राद्ध अनन्त पुण्यदायी है।
6. किसके घर में सूतक-पातक हैं उसके घर किसी ग्रहण का सूतक नहीं लगता है। न ग्रहणकाल का कोई दोष है। ग्रहण के निमित्त किए जाने वाले स्नानादि की भी सूतकी को कोई आवश्यकता नहीं है।
7. श्राद्ध में और मृत्यु होने पर ग्रहण का सूतक नहीं लगता है।
8. सूतक में भी ब्राह्मण भोजन करवाया जा सकता है। यदि सम्भव हो तो।
9. अमावस्या - पूर्णिमा को ग्रहण के दिन जिस किसी के भी घर में श्राद्ध कर्म होता है और सहजता से भोजन करने वाले ब्राह्मण मिल रहे हों तो सूतक काल में भी श्राद्ध करने और श्राद्ध प्रसाद ग्रहण करने का दोष नहीं है। परन्तु लोकाचार में हेय सा है।
श्राद्ध अपने आप में ग्रहण और ग्रहण के सूतक से ऊपर है। इस पक्ष को बुद्धिसम्पन्न महानुभावों को समाज में पुनर्स्थापित करना चाहिए।
पितरों का विशेष आशीर्वाद होता है तब ग्रहण के दिन श्राद्ध करने का सौभाग्य प्राप्त होता है किसी को।
यह चन्द्र ग्रहण पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्र और सिंह राशि पर हो रहा है।
पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्र में चन्द्र ग्रहण होने से यह ग्रहण आग्नेय मण्डल नाम से जाना जाएगा। जिसका फल अच्छा नहीं कहा गया है -
अस्मिन्नक्षत्रयोगे यदि चलति मही चन्द्रसूर्यग्रहो वा।
निर्वातोल्काऽशनीनां कथमपि पतने दर्शने चापि केतो:।।
दह्यन्ते काननानि प्रबलतरमही तीव्रतेजा: पतङ्गा।
रोगै: पित्त ज्वराद्यैर्निखिलतनुगतै: पीड्यते जीवलोक:।।
यह ग्रहण प्राकृतिक आपदा, भूकम्प, तेज गर्मी आदि को देने वाला है।
सिंह राशि वाले जातकों और पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्र में जन्मे जातकों या मो मौ ट टा टि टी टु टू आदि वर्णों के नाम वाले लोगों के यह ग्रहण शुभ नहीं है। इन्हें अत्यधिक दान पुण्य करके दोष से मुक्ति के प्रयास करने चाहिए।
सिंह के साथ मेष वृष कर्क कन्या धनु मकर और कुम्भ राशि वालों के लिए भी यह ग्रहण पीड़ा कारक है।
यथाशक्ति दान-पुण्य, पूजा पाठ अर्चना से दोष निवारण होता ही है।
पंडित कौशल दत्त शर्मा
प्राचार्यचर - संस्कृत शिक्षा
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