होलिका दहन मध्य रात्रि बाद भद्रापुच्छ में ही श्रेयस्कर है।
डॉ. कौशल दत्त शर्मा
सेवानिवृत्त प्राचार्य- संस्कृत शिक्षा
नीमकाथाना राजस्थान
9414467988
शास्त्रों में होलिका दहन का मुख्य समय भद्रा रहित प्रदोषकाल कहा है।-
प्रदोष व्यापिनी ग्राह्मा पूर्णिमा फाल्गुनी सदा।।
और भी कहा है -
निशागमे तु पूज्येत होलाका सर्वतोमुखी।।
भद्रा अर्थात् विष्टि करण में, प्रतिपदा एवं चतुर्दशी तिथि में तथा दिन में जहां होलिका दहन होता है वह गांव और देश आने वाले वर्ष में भयंकर प्राकृतिक आपदाओं से पीड़ित रहता है।
कहा भी है-
प्रतिपद्भूतभद्रासु यार्चिता होलिका दिवा।
संवत्सरं च तद्राष्ट्रं पुरं दहति साद्भुतम्।।
ऐसा ही और भी कहा है -
नन्दायां नरकं घोरं भद्रायां देशनाशनम्।
दुर्भिक्षं च चतुर्दश्यां करोत्येव हुताशन:।।
और भी कहा है -
भद्रायां दीपिता होली राष्ट्रभंगं करोति वै।।
अर्थात् जो भद्रा में होलिका दहन करते हैं वे निश्चित राष्ट्र भंग करते हैं। जो प्रत्यक्ष घटित हो रहा है।
भद्रायां द्वे न कर्त्तव्ये... वचन भी भद्रा को दूषित मानता है।
होलिका दहन किस दिन और किस समय पर हो इसको लेकर पंचांग कर्ताओं ने अपने-अपने पंचांगों में चार प्रकार के निर्णय दिए हैं। इन विसंगति पूर्ण निर्णयों से दैशिक पण्डित और धर्मिष्ठ लोग अत्यन्त भ्रमित हो रहे हैं।
पञ्चाङ्गो के चार निर्णय-
प्रथम पक्ष-
होलिका दहन 2 मार्च सोमवार को सूर्यास्त बाद प्रदोषकाल में करें।
-यह निर्णय पूर्णतया अशुद्ध एवं अशास्त्रीय है। पूर्व कथित वचनों के अनुसार भद्रा में होलिका दहन गांव एवं राष्ट्र के लिए कष्टदायी है। ऐसा निर्णय देने वाले ग्रन्थों को वचनों को समझना ही नहीं चाहते।
प्रदोषे ज्वालयेद्वह्निं... या अन्य वचनों का सहारा लेकर निशीथ पश्चात् होलिका दहन न करने के प्रमाण पूर्णतः निर्मूल हैं।
वीरमित्रोदय समय प्रकाश 101 पर स्पष्ट लिखा है कि-
इत्यादि वाक्यानि तानि निर्मूलानि।
वहीं लिखा है कि
यदा तु पूर्वत्र भद्रारहित: कालो न लभ्यते परतोपि च न प्रदोषव्याप्ति: तदा पूर्वत्रैव भद्रापुच्छे कार्यम्।।
अतः निशीथ के पश्चात् भद्रा पुच्छ में या भद्रा उपरान्त होलिका दहन करने में कोई दोष नहीं है। वहीं लिखा हैं-
होला भद्रावसाने च निशीथान्तेऽपि दीपयेत्।।
अतः ऐसी स्थिति में भद्रा पुच्छ काल ही मुख्य पक्ष है न कि प्रदोषकाल।
द्वितीय पक्ष-
सूर्योदय से पूर्व भद्रा समाप्ति के बाद के बाद होलिका दहन करें।
-यह पक्ष वहीं समुचित है जहां भद्रा 56 घटी से न्यून है अर्थात् जहां सूर्योदय से चार घटी पूर्व ही भद्रा समाप्त हो गई हो, अन्यत्र स्थानों पर नहीं। अरुणोदयकाल, उष:काल, प्रातःकाल, सूर्योदयकाल में होलिका दहन नहीं करना चाहिए। क्योंकि 56 घटी के बाद अरुणोदय काल प्रारम्भ हो जाता है। अरुणोदय - प्रातःकाल दिन का ही अङ्ग है। दिन में होलिका दहन का निषेध है।
काल माधव में अरुणोदय परिभाषा-
चतस्रो घटिका प्रातररुणोदय उच्यते।
धर्मसिंधु में भी कहा है -
सूर्योदयात् प्राक् चतुर्घटिकात्मकोरुणोदय:।
और भी कहा है-
नाडिका षट्पञ्चाशत प्रातस्त्वेकोऽधिकोऽरुण:।
उष:कालोऽष्टपञ्चाशत् शेष: सूर्योदय: स्मृत:।।
एक वचन और भी मिलता है-
पञ्च पञ्च उषः कालः सप्त पञ्चारुणोदयः।
अष्टपञ्चाशद् भवेद् प्रातः शेषः सूर्योदयः स्मृतः।।
अर्थात् अरुणोदय आदि दिन के ही भाग है। इसी कारण हम ब्रह्ममुहूर्त में प्रातः सन्ध्या के समय सङ्कल्प में आने वाले दिन के तिथ्यादिक प्रयुक्त करते हैं न कि तात्कालिकी।
महर्षि मनु महाराज 7/45 पर चतुर्थ याम के कर्तव्य लिखे हैं -
उत्थाय पश्चिमे यामे कृतशौचः समाहित:।
हुताग्निर्ब्राह्मणांश्चार्च्च्य प्रविशेत् स शुभां सभाम्॥
अरुणोदय काल और उससे पूर्व समय में यति-संन्यासी बटुक या अन्य कोई स्नान करें तो गंगाजल से स्नान करने के सदृश पुण्य फल प्राप्त होता है।
कहा भी है -
यतीनां स्नानकालोऽयं गङ्गाम्भःसदृशः स्मृतः।।
एक प्रहर आठ घटी का होता है।
परम्परावादी लोग भ्रमवश चार प्रहर का दिन और चार प्रहर की रात मानते हैं। शास्त्रों में रात्रि के प्रारम्भ की चार घटी और रात्रि के अन्त की चार घटी दिन ही कही गयी हैं। इसीलिए शास्त्रकारों ने रात्रि-रजनी को त्रियामा कहा है -
त्रियामां रजनीं प्राहुस्त्यक्त्वाद्यन्तचतुष्टयम्।
नाडीनां तदुभे सन्ध्ये दिवसाद्यन्तसंज्ञिते।।
इसीलिए पूर्वाचार्यों ने 56 घटी बाद की अन्तिम चार घटियां दिवस तुल्य मानते हुए होलिका दहन में स्वीकार नहीं की हैं।
यहां प्रश्न पैदा होता है कि प्रदोषकाल की छ: घटियों में से प्रारम्भ की चार घटियां भी तो दिन संज्ञक हैं फिर वो त्याज्य क्यों नहीं?
इसका उत्तर है कि होली दीपावली नक्त व्रत आदि के लिए प्रदोष काल ही मुख्य काल है।
भद्रोत्तर, निशीथकाल, पुच्छकाल या चतुर्थयाम ये सब गौण काल हैं जिनकी ग्राह्यता विकल्प में ही है न कि प्रधानता में। हमें होली आदि में दोषरहित प्रदोषकाल मिल रहा हो तो क्या कहने।
कतिपय विद्वान् 56 घटी को नकारते हुए शेष: सूर्योदय: स्मृत:... वचन को आधार मानते हुए 58 घटी पूर्व समय को होलिका दहन में ग्रहण करते हैं जो शास्त्र विरुद्ध है, निर्मूल है।
फिर 58 घटी ही क्यों? वास्तविक सूर्योदय पूर्व भी होलिका दहन के लिए कौन मना कर रहा है इनको।
अरुणोदय काल पूर्व होलिका दहन पक्ष की परम पुष्टि काशी जी सुप्रसिद्ध ऋषिकेश पंचांग ने की है। जो सिद्ध करता है कि अरुणोदय पूर्व 56 घटी तक भद्रा समाप्त हो तब ही सुबह होलिका दहन करें अन्यथा नहीं।-
अरुणोदय पूर्व भद्रा रहित पूर्णिमा तिथि में रा. शे. 4.56 बाद होलिका दहन होगा।
तृतीय पक्ष-
तीन मार्च को सायं प्रदोषकाल मेंं होलिका दहन करें।
दूसरे दिन ग्रस्तोदित चंद्र ग्रहण होने से यह पक्ष सर्वथा अनुचित है। निर्णयसिन्धुकार ने स्पष्ट लिखा है कि-
अथ परेह्नि ग्रस्तोदयस्तदा पूर्व दिने भद्रावर्ज्यं रात्रि चतुर्थ यामे विष्टिपुच्छे वा होला कार्या।
दूसरे दिन ग्रहण नहीं होता तो सार्द्धत्रियामा पूर्णा ... प्रतिपद्वृद्धिगामिनी.. वाक्यों पर दृष्टिपात करते तो कुछ समझ में आता।
-तीन मार्च को प्रदोषकाल में पूर्णिमा है ही नहीं, प्रतिपदा व्याप्त है जो पूर्णतः त्याज्य गौणकाल है।
यह पक्ष तभी ग्राह्य होता जब पहले दिन प्रदोषकाल में पूर्णिमा नहीं होती। प्रतिपदा में होलिका दहन के लिए सभी निषेध करते हैं।-
प्रतिपद्यग्निकरणं द्वितीयायां गवार्चनम्।
क्षत्रच्छेदं करिष्येते वित्तनाशं कुलक्षयम्।।
अर्थात् जो व्यक्ति प्रतिपदा में होलिका दहन, द्वितीया में गोक्रीडा करते हैं वे अपने राष्ट्र का, स्वयं के धन का और कुल का नाश ही करते हैं।
पूर्व में ही कहा है -
नन्दायां नरकं घोरम्... प्रतिपद्भूतभद्रासु...
और भी स्पष्ट लिखा है कि -
*
चतुर्थ पक्ष-
मध्यरात्रि बाद भद्रापुच्छ काल में होलिका दहन करें।
इस बार होलिका दहन के लिए सबसे श्रेयस्कर पक्ष भद्रा पुच्छ काल ही है। साथ ही जहां भद्रा काल 56 घटी पूर्व समाप्त हो रहा है वहां भद्रोत्तर ही श्रेयस्कर है।।
किसी भी व्रतोपवास का शास्त्र सम्मत निर्णय एक ही होना चाहिए। अतः इन चार पक्षों में इस बार होलिका दहन दो मार्च को निशीथ काल पश्चात् भद्रा पुच्छ काल में ही श्रेयस्कर है।
नीमकाथाना राजस्थान में भद्रा पुच्छ काल निशीथ काल के पश्चात् 01.27 से 02.38 तक है। भद्रा पुच्छ काल तीन घटी अर्थात् 72 मिनट का होता है।इस समयावधि में होलिका दहन करना सर्वथा शुद्ध है।
तिथ्यर्क में स्पष्ट लिखा है कि -
यदा पूर्व दिने रात्रौ भद्रारहित कालौ न लभ्यते, परदिने च पूर्णिमाया: प्रदोष व्याप्त्यभावस्तदा भद्रा पुच्छे होला कार्या।
भद्रा पुच्छ काल में होलिका दहन के लिए निर्णय सिंधु के वचन पू्र्व में लिख ही दिए हैं।
महात्मा दिवोदास ने भी स्पष्ट ही लिखा है कि-
यदा तु पूर्वदिने भद्रा द्वितीय दिने चन्द्र ग्रहणं तदा पूर्वत्रैव भद्रापुच्छे होलाका कार्या।
विशेष-
पहले दिन प्रदोषकाल में भद्रा नहीं हो अर्थात् पूर्णिमा तिथि नहीं हो तो दूसरे दिन रात में चन्द्रग्रहण हो तो दूसरे दिन ग्रहण एवं प्रदोष काल में ही होलिका दहन करें।
भद्रा पुच्छ की महत्ता महर्षि लल्ल के वचनों में देखिए-
पृथिव्यां यानि कार्याणि शुभानि त्वशुभानि च।
तानि सर्वाणि सिध्यन्ति विष्टिपुच्छे न संशय:।।
अतः सर्व प्रकार से होलिका दहन आज रात भद्रा पुच्छ काल में निशीथ उपरांत 1.27 से 2.28 तक श्रेयस्कर है। अपने अपने रात्रि मान से 72 मिनट का भद्रा पुच्छ सम्भव है।
रंग खेलने की होली 3 मार्च की है इसमें ग्रहण का कोई दोष नहीं है।
चन्द्र ग्रहण -
कल ग्रस्तोदित चंद्र ग्रहण है।
ग्रस्त रहता हुआ चन्द्रग्रहण सूर्योदय बाद तक भी चल रहा होता है तो ग्रस्तास्त ग्रहण कहलाता है। उसका शुद्धिकरण सायं चन्द्र दर्शन बाद ही कहा गया है।
हमारे यहां राहु से ग्रसित चन्द्रमा सायं 6.24 पर दिखाई देगा और ग्रहण शुद्धि ( मोक्ष ) सायं 6.47 बाद होगी। ग्रहण का पर्वकाल मात्र 23 मिनट का है। वैसे पूर्वी देशों में सम्पूर्ण पर्व काल 3.27 मिनट का है।
*वैसे होली पर होने वाला यह चन्द्र ग्रहण खग्रास है। फिर भी है।
सिंह राशि वाले जातकों और पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्र में जन्मे जातकों या मो मौ ट टा टि टी टु टू आदि वर्णों के नाम वाले लोगों के यह ग्रहण शुभ नहीं है। इन्हें अत्यधिक दान पुण्य करके दोष से मुक्ति के प्रयास करने चाहिए।
सिंह के साथ मेष वृष कर्क कन्या धनु मकर और कुम्भ राशि वालों के लिए भी यह ग्रहण पीड़ा कारक है।
यथाशक्ति दान-पुण्य, पूजा पाठ अर्चना से दोष निवारण होता ही है।
3 मार्च 2026 मंगलवार को अपने-अपने नगर में जिस भी समय सूर्यास्त हो, सूर्यास्त के बाद से सायं 18.47 तक पूरे देश में खग्रास चंद्रग्रहण रहेगा।
पूर्णिमा का चन्द्रोदय सूर्यास्त के बाद ही होता है।
होलिका दहन 2 मार्च 2026 सोमवार को मध्य रात्रि बाद भद्रा पुच्छ काल में श्रेयस्कर है।
भद्रा युक्त प्रदोषकाल में,, अरुणोदय काल में अर्थात् जहां भी भद्रा का मान 56 घटी से अधिक हो वहां और दूसरे दिन सायं काल प्रतिपदा तिथि में अपना और राष्ट्र का हित चाहने वालों को भूलकर भी होलिका दहन नहीं करें।
चांद पूर्णिमा का व्रत 2 मार्च को शुभ है।
सत्यनारायण व्रत एवं व्रत कथा,, पूर्णिमा व्रत,, पूर्णिमा व्रत निमित्त स्नान, दान एवं अन्य पुण्य कर्म 3 मार्च को सूर्योदय पूर्व अर्थात् सूतक लगने से पूर्व और ग्रहण शुद्धि के पश्चात् अर्थात् सायं 6.47 बाद ही करना श्रेयस्कर है।
2 मार्च को पूर्णिमा तिथि सूर्यास्त से पूर्व प्रारम्भ होकर 3 मार्च को सूर्यास्त पूर्व ही समाप्त हो जाएगी।
ब्यावली महिलाएं और कुंवारी कन्याएं 3 मार्च को ग्रहण सूतक लगने से पूर्व अर्थात् सूर्योदय पूर्व ही होलिका दर्शन करके गणगौर पूजा प्रारम्भ कर लें जिससे सौभाग्य वृद्धि हो।
धुलेण्डी 3 मार्च को ही श्रेयस्कर है।
छारेण्डी खेलना, रंग-गुलाल लगाना, मर्यादाहीन हंसी-मजाक करना 3 मार्च को ही शुभ है।
होलाष्टक 3 मार्च को सूर्यास्त पूर्व समाप्त होंगे।
3 मार्च को 18.47 बजे बाद चन्द्र ग्रहण के शुद्ध होते ही स्नानादि से निवृत्त होकर घर के मन्दिरों की साफ-सफाई करके पूजा-अर्चना करें।
मन्दिरों में फूल-डोल करना, दोलोत्सव अर्थात् भगवान जी को झूला झूलाना एवं रंग-गुलाल लगाना आदि ग्रहण शुद्धि के बाद 3 मार्च को ही श्रेयस्कर है।
2 मार्च,, 3 मार्च और 4 मार्च को शास्त्रानुमोदित "" करिदिन "" हैं जो शुभ कार्यों में त्याज्य हैं।
वर्ष में लगभग सात दिन "" करि दिन"" संज्ञक कहे गए हैं जो अशुभ माने गये हैं भूलकर भी इन दिनों में कोई भी शुभ कार्य नहीं करना चाहिए।
संक्रान्ति, ग्रहण, अयन परिवर्तन, होलिका दहन का दिन और उससे अगला दिन "करि संज्ञक" कहे गए हैं।
प्रदोष व्रत 1 मार्च रविवार को है।
होली के लिए बड़कूलों की माला 2 मार्च को मध्याह्न- अभिजित मुहूर्त तक बनाना श्रेयस्कर है। सायं भद्रा पूर्व भी गौणकाल ग्राह्य है।
हमारे यहां होली के दूसरे दिन सांपदा माता (सम्पदा माता) के डोरे लिये जाते हैं, दूसरे दिन 3 मार्च को सूर्योदय 6.30 बजे से चन्द्र ग्रहण का सूतक प्रारंभ हो जाएगा अतः अपने अपने स्थान के सूर्योदय से पहले सांपदा माता की कहानी सुनकर डोरे लेना शुभ रहेगा।
आपत्ति काल में सायं 6.47 बाद भी लिए जा सकते हैं
फाल्गुनी पूर्णिमा मन्वादि तिथि है जो 3 मार्च को ही ग्रहण करें।
अन्त में मैं ऋषि वचनों का अनुपालन करते हुए उन्हीं के शब्दों में कहना चाहूंगा कि-
होलिकाप्रदीपनम् सेवासौकर्याय पूर्वदिने रात्रौ भद्रामुखं त्यक्त्वा भद्रापुच्छे वा शास्त्रोक्तत्वादुचितमेवेत्याकलनीयं सुधिभि:।
विद्वज्जनों के सम्मुख ऋषि वचनों का दूसरा पक्ष भी रखना चाहूंगा-
होलिका प्रदीपनम् बहुधा निर्णीतं तथापि भक्तिमार्गे यथा सेवा सौकर्यं तथा कार्यम्।।
चन्द्र ग्रहण विमर्श -
राजस्थान और गुजरात के पश्चिमी सीमान्त जैसलमेर, बाड़मेर, जूनागढ़, जामनगर आदि क्षेत्रों को छोड़कर सम्पूर्ण भारत में 3 मार्च मंगलवार को चन्द्र ग्रहण होगा।
यह ग्रहण होलिका दहन से अगले दिन फाल्गुनी पूर्णिमा को भारत से पूर्वी देशों में 15.20 बजे से प्रारम्भ होता हुआ सायं सूर्यास्त के बाद 6.47 बजे समाप्त होगा।
मंगलवार को सायं सूर्यास्त के बाद ग्रस्तोदित चन्द्रमा अर्थात् ग्रहण लगा हुआ चन्द्रमा उदित होगा और सायं 6.47 बजे एकदम शुद्ध हो जाएगा।
जहां भी चन्द्रोदय 5.33 से पूर्व होगा वहां खग्रास अर्थात् पूर्ण चंद्रग्रहण दिखाई देगा और जहां 5.33 के बाद चन्द्रोदय होगा वहां शुद्ध होता खण्डग्रास चन्द्रग्रहण दिखाई देगा।
ग्रहण का सूतक-
सामान्यत: चन्द्रग्रहण का सूतक ग्रहण दिखाई देने से तीन प्रहर अर्थात् नौ घंटे पहले प्रारम्भ होता है और सूर्य ग्रहण का सूतक ग्रहण लगने से चार प्रहर अर्थात् 12 घंटे पहले प्रारम्भ हो जाता है।
जहां सूर्यास्त 5.04 से पहले होगा वहां आकाश में चन्द्रमा काली थाली के समान दिखाई देगा। काली थाली जैसा चन्द्रमा लगभग तीस मिनट रहेगा। 5.33 बाद सूर्यास्त वाले क्षेत्रों में ग्रहण शुद्ध होता हुआ दिखाई देगा।
ग्रहण के दिन नीमकाथाना क्षेत्र में सभी धार्मिक कृत्यों को सूतक लगने से पूर्व प्रातः 6.24 से पहले सम्पन्न कर लें। प्रातः 5.20 अरुणोदय से पहले कर लें तो और भी श्रेयस्कर होगा।
सभी स्थानों पर मन्दिरों में भी सूतक लगने से पहले आरती आदि सम्पन्न कर लेनी चाहिए।
ग्रहण से पूर्व स्नान, मध्य में हवन जपार्चन एवं अन्त में शुद्धिस्नान का विधान है। ग्रहण काल में ही सम्पूर्ण पर्व काल को ही पुण्यकाल कहा गया है। ग्रहण में संक्रान्ति की भांति पूर्व या पश्चात् पुण्य काल नहीं होता है। ग्रहण काल में पुस्तक माला आसन स्पर्श का दोष नहीं होता है।
*सायं 6.47 बाद शुद्धिकरण के पश्चात नूतन यज्ञोपवीत धारण कर पूजा अर्चना कर भोजन आदि ग्रहण करें।
पंडित कौशल दत्त शर्मा
नीमकाथाना राजस्थान
