शीतलाष्टमी बुधवार को
हमारे व्रतोपवास एवं सनातनी परम्पराओं का मूल आधार तार्किक रूप से वैज्ञानिक ही है। ये परम्पराएं आत्म कल्याण और आत्म शुद्धि के साथ स्वास्थ्य लाभ के प्रति संवेदनशील रही है। हमारे ऋषि-मुनियों ने तदनुरूप जीवनशैली अपनाकर अपने अनुभवों के आधार पर ऋतुओं की प्रकृति के अनुरूप व्रतोपवासों में आहार एवं आचरण को महत्त्व दिया है।
गर्मियों के दुष्प्रभाव को कम करने एवं शरीर की गर्मी को शान्त रखने के लिए इस ऋतु में ठण्डा व बासी भोजन करने की प्रेरणा शीतलाष्टमी व्रत से मिलती है।
इस बार शीतलाष्टमी का पर्व चैत्र कृष्णाष्टमी 11 मार्च बुधवार को ही मनाया जाना श्रेयस्कर है।
स्कन्द पुराण में कहा है -
चैत्रमास्यसिते पक्षे याष्टमी शीतलाह्वया।
वहीं कहते हैं कि-
तमारभ्य प्रकर्तव्यं यावन्मासचतुष्टयम्
अर्थात् इस दिन से आने वाले चार मास चैत्र वैशाख ज्येष्ठ आषाढ़ में अष्टमी को ठण्डा-बासी भोजन करना चाहिए। कतिपय विद्वान् श्रावण कृष्णाष्टमी को भी जोड़ते हैं जो तार्किक भी है।
संकेत और संदेश स्पष्ट है कि स्वास्थ्य लाभ के लिए इन चार मास सुबह ठण्डा-बासी भोजन करना ही चाहिए।
हेमाद्री में चैत्र कृष्ण अष्टमी को सन्तान अष्टमी का व्रत भी कहा है।-
कृष्णाष्टम्यां चैत्रमासे स्नातोनियतमानस:।
अर्थात् चैत्र से श्रावण तक चार मास तदनुसार आचरण कर स्वस्थ और योग्य सन्तान प्राप्त की जा सकती है।
अन्न भगवान अर्थात् अन्नपूर्णा माता का विशेष कृपा प्रसाद है पर्युषित (बासी) भोजन। निश्चित रूप से अन्न में प्राणों का वास है।
मां दुर्गा - पार्वती का अवतार है शीतला माता।
चर्मरोग चेचक चिकनपाक्स आदि रोगों के प्रकोप से रक्षा करती हैं मां।
बासोड़ा के दिन शीतलस्वरूपा अन्नपूर्णा मैया की पर्युषित नैवेद्य से पूजा अर्चना कर बासी भोजन ही करना चाहिए।
शीत का अन्त - बसन्त आते ही शीतल बासी भोजन करना प्रारम्भ कर सकते हैं। अर्थात् गर्मागर्म भोजन से परहेज़ रखें।
अच्छे स्वास्थ्य और समृद्धि की कामना करने का दिन है शीतला अष्टमी।
नाम शीतल तो शीतल - सौम्य दिन ही करें मां से स्वास्थ्य समृद्धि की कामना।
भारत में विभिन्न मत हैं शीतला माता की पूजा अर्चना के लिए।
शीतला पूजन में सौम्य वार अर्थात् शीतल वार श्रेष्ठ और उग्र वार अर्थात् क्रूर वार नेष्ट माने जाते हैं। सोमवार को बास्योड़ा मनाया जाना अत्यन्त शुभ फलदायी और सुखद है।
सोमवार की होली हो तो सोमवार को शीतला पूजन निषेध है।
ऐसी लोकमान्यता है कि जिस वार को होलिका दहन होता है उस वार को बास्योड़ा नहीं मनाया जाता है। अर्थात् वार की वार शुभ नहीं माना जाता है।
शास्त्रीय मत एवं लोक मान्यता अनुसार होली के बाद उग्र वारों ( रविवार, मंगलवार, शनिवार ) को छोड़कर सौम्य वार ( सोमवार, बुधवार, गुरुवार और शुक्रवार ) को ही शीतलाष्टमी जिसे शीतला सप्तमी भी कहते हैं, मनायी जानी चाहिए। सप्तमी विद्धा अष्टमी को विशेष शुभ मानते हैं।-
चैत्र कृष्णाष्टम्यां शीतलाष्टमी सा च सप्तमीयुता ग्राह्या।
और भी कहा है कि चैत्र कृष्ण सप्तमी या अष्टमी अनुराधा या ज्येष्ठा नक्षत्र से युक्त हो तो क्या कहने। इस दिन शीतल जल और शीतल भोजन से माता का पूजन करने से बालकों का स्वास्थ्य ठीक रहता है और शरीर में गर्मी का प्रकोप शान्त होता है।-
ज्येष्ठामैत्रर्क्ष संयोगे तोयमन्नं समर्पयेत्।
बालानां शान्तिदश्चैव इति दैवविदोविदु:।।
अष्टमी तिथि तो रूढ़ है अर्थात् शीतला पूजन में अष्टमी ही हो ऐसी कोई अनिवार्यता तो नहीं है।
शास्त्रों में सभी तिथियों की अनुकूलता बनाए रखने के लिए ध्यान प्रार्थना दी गयी हैं।-
सप्तमी तिथि का स्वरूप एवं ध्यान-
ताम्रवर्णाब्ज पात्रा सा हयस्था सप्तमी मता।
और भी-
नीलकुन्तेन्दु कण्ठा सा जटा खण्डेन्दु भूषिता।
इभस्था सप्तमी गौरी द्विभुजा वज्रधारिणी।।
अष्टमी तिथि का स्वरूप एवं ध्यान-
प्रेतगा चाष्टमी रक्ता कृष्णग्रीवासितांशुका।
अक्षं खड्गं तथा खेटं पात्रं धत्ते चतुर्भुजा।।
शीतला पूजन में शास्त्रीय आदेशों के साथ लोक परम्पराएं प्रबल होती हैं। यथा-
जिस वार की होली होती है उस वार को शीतला पूजन नहीं होता है। अर्थात् जिस वर्ष होलिका दहन सोमवार को हुआ हो उस वर्ष सोमवार को शीतला पूजन नहीं होगा।
शीतला पूजन से बारहवें दिन गणगौर नहीं आनी चाहिए। भूल से भी गणगौर से पूर्व बारहवें दिन शीतलाष्टमी पर्व नहीं करें।बारह दिन पूर्व शीतला पूजन करने से सौभाग्यवती महिलाओं और बालकों के लिए आने वाला समय शुभकारक नहीं माना जाता है।*
अष्टमी के दिन क्रूर/उग्र संज्ञक वार होने से त्याज्य है। सोमवार का विशेष महत्व है।
होली से चौथे, पाँचवे, छठे सातवें दिन किसी भी सौम्य वार को तो बास्योड़ा मनाया जा सकता है। अर्थात् शीतला सप्तमी-अष्टमी मनायी जा सकती है।
कतिपय स्थानों पर होली के दिन से सातवें दिन तक नित्य जल का कलश शीतला माता के चढ़ाते हैं और सातवें दिन ही शीतलाष्टमी मानते हैं। वह उस स्थान विशेष की लोक मान्यता है जो दोषपूर्ण नहीं कही जा सकती है।
व्रत के दिन परिवार में किसी भी प्रकार का छोटा-बड़ा विघ्न आने की सम्भावना हो तो आने वाले सौम्य वारों को भी बास्योड़ा मनाया जा सकता है।
"अष्टमी तिथि" शब्द तो रूढ़ है।" अर्थात् किसी भी तिथि को शीतलाष्टमी मनायी जा सकती है। शुभ वार का विधान तो है ही।
कैसे मनाएं शीतला माता का पर्व -
सौम्य वार से पहले दिन सायं विभिन्न व्यञ्जन बनाएं। हमारे यहां राँधा-पूआ ( मीठा भात, मीठा बाजरा, राबड़ी, हलवा, गुलगुला-पुआ, पकोड़ी, पूड़ी आदि ) बनाए जाते हैं। इस बार मंगलवार की रात प्रसाद बनाया जाएगा।
दूसरे दिन पर्युषित अर्थात् बासी अन्न, समर्पण भावना के साथ शीतला देवी को अर्पित करें।
पूजा के लिए सुबह दश मिट्टी के कुंडारे - कंडवारे - सराई में सब पकवान रख हल्दी से तिलक व पूजा अर्चना करें। लोकाचार में जो मान्यता हो उसे प्राथमिकता दें।
माता के मन्दिर में जाकर ठंडा (पर्युषित) प्रसाद चढ़ावें और कुंभ के शीतल जल से शीतला माता को सींचें। जाये-ब्याहे पर दस कंडवारे अलग से चढ़ावें। और प्रार्थना करें। हे शीतला माता हमारे पापों का विनाश करते हुए हमें वंशवृद्धि के साथ सुख सौभाग्य प्रदान करें। आपको बारम्बार नमन।-
ॐ शीतला मात्रे नमो-नम:।
और प्रार्थना करें -
कुम्भे स्थापयेद्देवीं पूजयेन्नाम मन्त्रत:।
शीतले दह मे पापं पुत्रसौख्यफलप्रदे।।
माता से विशेष प्रार्थना भी करें -
धनधान्यप्रदे देवि पूजां गृह्ण नमोस्तुते।
शीतले शीतलाकारे अवैधव्य सुतप्रदे।।
फोड़ा फुंसी चेचक-माता आदि रोग दोष से मुक्ति, दुःख दारिद्र्य से परिवार की रक्षा, स्वस्थ सुखी समृद्ध जीवन निर्वहन करने, वंशवृद्धि पुत्रसन्तति एवं वंश संरक्षण हेतु शीतला माता की हर घर में शीतल पकवानों से पारिवारिक परम्परानुसार पूजा अर्चना करनी चाहिए।
बास्योड़ा के दिन सब ठण्डा भोजन करें। ठंडे भोजन को दही के साथ खाने और माता के चढ़ाने का विशेष महत्व है-
शीतलेऽन्नानि पक्वानि दध्ना समन्वितानि च।।
सौभाग्यशाली सुखी समृद्ध जीवन, पतिसुख के साथ दीर्घायुष्य जीवन, धनधान्य की प्राप्ति के लिए इस दिन माताएँ सिलाई ना करें, सिर ना धोएँ और घर में कोई क्रोध भी ना करें। शीतला पूजन में भद्रा आदि का कोई दोष नहीं होता है।
शीतला माता की प्रार्थना के साथ विशेष ध्यान का मन्त्र..
नमामि शीतलां देवीं, रासभस्थां दिगम्बराम्।
मार्जनी - कलशोपेतां, शूर्पालङ्कृत-मस्तकाम्।।
स्कन्द पुराण में "नमामि" के स्थान पर "वन्देऽहं" पाठ लिखा है।
मां का ध्यान - मां शीतला देवी गधे पर विराजमान हैं, वह दिगम्बरा हैं, एक हाथ में झाड़ू और दूसरे हाथ में घड़ा लिए हुए हैं, सिर पर छाज अर्थात् सूप अलंकृत है ऐसी माता शीतला देवी को मैं प्रणाम करता हूं।
ये दिन शीतला निकलने के होते हैं। यह प्रार्थना शीतला के प्रकोप से बचने का मूल मंत्र है। अर्थात् माता का प्रकोप हो जाए तो-
शीतला दिगम्बरा हैं अतः शीतला के रोगी को कपड़े त्याग देने चाहिए, गधे की पिण्डी से फोड़े फुन्सियों की जलन कम होती है, झाड़ू नीम आदि रक्षक हैं, मां कलश हाथ में लिए हैं अर्थात् रोगी को मटके का ठण्डा जल ही पिलावें आदि आदि।
शीतला माता की नवमी तिथि में पूजा पूर्णतः निषेध कही गयी है। सप्तमी विद्धा अष्टमी श्रेयस्कर है।-
सप्तमी सहिता कार्य्या चैत्र कृष्णाष्टमी सदा।
नवम्यां नाधिकारोऽस्ति शीतला पूजते मुने।।
विशेष पूजा में निम्न संकल्प करें -
.... मम परिवारे पित्तादि दोषजन्य मसूरिका स्फोटक गण्डादि त्वग् विकाराणां प्रवृत्ति रोधाय श्रीशीतलां मातरं सम्पूजयिष्ये।।
इस दिन शीतलाशतक, शीतलाष्टक शीतलोपनिषद् आदि के पाठ करने से वर्ष पर्यन्त मां की कृपा बरसती है।
तैत्तिरीयोपनिषद् में बहुत ही सुन्दर शब्दों में अन्न की महत्ता बताई गई है। जीवन में कभी भी अन्न का निरादर नहीं करें क्योंकि अन्न ही प्राण हैं।-
अन्नं न निन्द्यात्। तद् व्रतम्। प्राणो वा अन्नम्।शरीरमन्नादम्। प्राणे शरीरं प्रतिष्ठितम्। शरीरे प्राणः प्रतिष्ठितः। तदेतदन्नमन्ने प्रतिष्ठितम्।स य एतदन्नमन्ने प्रतिष्ठितं वेद प्रतितिष्ठति। अन्नवानन्नादो भवति। महान् भवति प्रजया पशुभिर्ब्रह्मवर्चसेन। महान् कीर्त्या॥
इन मन्त्रों का अन्वय-
अन्नं न निन्द्यात्। तत् व्रतम्। प्राणः वै अन्नम्। शरीरम् अन्नादम्। प्राणे शरीरं प्रतिष्ठितम्। शरीरे प्राणः प्रतिष्ठितः। तत् एतत् अन्नम् अन्ने प्रतिष्ठितम्। यः एतत् अन्नम् अन्ने प्रतिष्ठितं वेद सः प्रतितिष्ठति। अन्नवान् अन्नादः च भवति। प्रजया पशुभिः ब्रह्मवर्चसेन च महान् भवति। कीर्त्या च महान् भवति ।
तुम अन्न की निन्दा नहीं करोगे; कारण, वह तुम्हारे श्रम का व्रत है। वस्तुतः प्राण भी अन्न है, तथा शरीर भोक्ता है। शरीर प्राण पर प्रतिष्ठित है तथा प्राण शरीर पर प्रतिष्ठित है। अतएव यहाँ अन्न पर अन्न प्रतिष्ठित है। जो इस अन्न पर प्रतिष्ठित अन्न को जानता है, वह स्वयं सुदृढ प्रतिष्ठा प्राप्त करता है, वह अन्न का स्वामी (अन्नवान्) एवं उसका भोक्ता बन जाता है। वह प्रजा (सन्तति) से, पशुधन से, ब्रह्मतेज से महान् बन जाता है, वह कीर्ति से महान् बन जाता है।
इसलिए अन्न और जल का नित्यमेव आदर करें संरक्षण करें व्यर्थ न गंवाएं। आजकल आयोजनों में आवश्यकता से अधिक प्लेट में भरकर अत्यधिक जूठन छोड़ने का शौक चढ़ता जा रहा है आस्थाहीन लोगों में, इससे तो अवश्य ही बचना चाहिए। शीतला माता स्वयं पर्युषित भोजन और शीतल जल ग्रहण कर बहुत बड़ा सन्देश दे रही हैं। अन्न और जल का सदुपयोग करने से हम स्वयं, हमारा परिवार, हमारा क्षेत्र और हमारा राष्ट्र सुखी समृद्ध होगा। यह महामन्त्र है।
अन्नं वै प्राणा:! अन्नं वै प्राणा:!! अन्नं वै प्राणा:!!!
शिवा आप: सन्तु - सन्तु शिवा आप:! सन्तु शिवा आप:!! सन्तु शिवा आप:!!!
पं.कौशल दत्त शर्मा
सेवानिवृत्त प्राचार्य संस्कृत शिक्षा
नीम का थाना राजस्थान
9414467988
