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दुर्गा सप्तशती पंचम अध्याय का रहस्य: “नमस्तस्यै नमो नमः” का शास्त्रीय पाठ और सही विधि- डॉ. कौशल दत्त शर्मा



 डॉ. कौशल दत्त शर्मा

              सेवानिवृत्त प्राचार्य संस्कृत शिक्षा 


श्री दुर्गासप्तशती के पंचम अध्याय के "नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः" इन 66 त्रिपान्मन्त्र या अवदान मन्त्रों को तीन-तीन बार बोलने की जो प्राचीन शास्त्रीय विधि है वह परम्परा से चल रहे पाठ से थोड़ी सी भिन्न है। 

यह विशेष पाठ प्राचीन काल से ही दक्षिण भारत के विद्वज्जनों द्वारा प्रयोग में लिया जाता रहा है। इस पूर्णतः प्रामाणिक एवं शास्त्रीय पाठ का प्रयोग हमें भी करना चाहिए।


उदाहरणार्थ पंचम अध्याय के एक मंत्र को तीन भागों में हमें समझना होगा।


प्रथम दृष्टया परम्परा में जो स्वीकार्य है।

यथा-


या देवी सर्वभूतेषु मातृरूपेण संस्थिता।

नमस्तस्यै १, नमस्तस्यै २, नमस्तस्यै नमो नमः ३।।


द्वितीय पक्ष जो पूर्णतः शास्त्रीय है-


इन अवदान या त्रिपान्मन्त्रों का प्राचीन काल में इस प्रकार से पाठ प्रसिद्ध था और आज भी है मेरे आचार्यत्व में ऐसा ही पाठ करने- करवाने का प्रयास करता हूं।-


या देवी सर्वभूतेषु मातृरूपेण संस्थिता।

नमस्तस्यै नमो नमः।।1।।


या देवी सर्वभूतेषु मातृरूपेण संस्थिता।

नमस्तस्यै नमो नमः।।2।।


या देवी सर्वभूतेषु मातृरूपेण संस्थिता।

नमस्तस्यै नमो नमः।।3।।


पांचवें अध्याय के इन 66 त्रिपाद मंत्रों का इस प्रकार शास्त्रीय विधि-विधान से पाठ करना कोई नया नहीं है पर लुप्तप्राय: सा तो है ही।


पाठ का यह क्रम पूर्णतः शास्त्रीय है इसीलिए पूज्यपाद बापूजी स्वर्गीय पंडित हनुमान प्रसाद जी जोशी विशेष उद्देश्य की संपूर्ति अर्थात् संकल्पसिद्धि के लिए इसी विधि से पाठ बताया करते थे।


दैनिक जीवन में एवं नवरात्र में मां भगवती की आराधना के लिए दुर्गा सप्तशती के सम्पूर्ण पाठ का महत्व तो है ही, उत्तर / उत्तम चरित्र के पाठ का और भी विशेष महत्व है।

 

यह चरित्र परमात्मा के रुद्र स्वरूप, विद्या-बुद्धिदायिनी मां सरस्वती के महास्वरूप, दुर्गा के सूर्य तत्व, भीमा शक्ति और  सामवेद अनुष्टुप् छ्न्द को समर्पित है।


शास्त्रों में रुद्र स्वरूप सामवेद का अग्नि देवता भी कहा गया है जो सूर्य स्वरूप ही है। सामवेद का जगती छ्न्द भी कहा गया है। 


दुर्गा सप्तशती के पंचम अध्याय के 14 वें मन्त्र से 80 वें तक में  "...नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः"  तीन चरणों वाले / तीन विभाजन वाले जो 66 त्रिपात् मन्त्र कहे गये हैं इन्हें अवदान मन्त्र भी कहा गया है। उनका वास्तविक स्वरूप जो पूर्णतया प्रामाणिक और शास्त्रीय है प्राचीन ग्रन्थों में इस प्रकार से अभिहित है।


प्रचलित मूल मंत्र यथा-


या देवी सर्वभूतेषु मातृरूपेण संस्थिता।

नमस्तस्यै।। नमस्तस्यै।। नमस्तस्यै नमो नमः।।


इस प्रकार के 21 / 22 मन्त्र हैं जिनका प्राचीन प्रतियों में मूल स्वरूप इस से भी दिया गया है।-

1.

या देवी सर्वभूतेषु, मातृरूपेण संस्थिता, नमस्तस्यै नमो नमः।।

2.

या देवी सर्वभूतेषु, मातृरूपेण संस्थिता, नमस्तस्यै नमो नमः।।

3.

या देवी सर्वभूतेषु, मातृरूपेण संस्थिता, नमस्तस्यै नमो नमः।।


जो 24 वर्ण वाले गायत्री मंत्र की भांति वास्तविक त्रिपाद अर्थात् तीन चरणों के रूप में प्रत्यक्ष भी है। इसमें वर्तमान में प्रचलित न्यूनाधिक वर्णों का विभाजन  नहीं दिया है।


उदाहरण के रूप में इसे सम्पुटित पाठ के रूप में देखते हैं-


सर्वाबाधा विनिर्मुक्तो..

1. या देवी सर्वभूतेषु मातृरूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमो नमः।।

सर्वाबाधा विनिर्मुक्तो....


सर्वाबाधा विनिर्मुक्तो...

2. या देवी सर्वभूतेषु मातृरूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमो नमः।।

सर्वाबाधा विनिर्मुक्तो...


सर्वाबाधा विनिर्मुक्तो...

3. या देवी सर्वभूतेषु मातृरूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमो नमः।। 

सर्वाबाधा विनिर्मुक्तो...


अन्वय में पूर्वभाग या देवी सर्वभूतेषु मातृरूपेण संस्थिता के आगे  तीनों नमस्तस्यै - नमस्तस्यै - नमस्तस्यै के साथ नमो-नम: उपपद को तीन बार जोड़ने पर 24-24 वर्णों से त्रिपात् मंत्र बनेंगे।


इस विषय को "आचार्य भास्कर राय" ने दुर्गा सप्तशती की अपनी गुप्तवती टीका में स्पष्ट भी किया है-


तेन या देवी सर्वभूतेषु मातृरूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमो नमः।।


इति चतुर्विंशत्यक्षरोऽष्टाक्षरै: त्रिभि: पादै: एको गायत्री गायत्री छंदस्को मन्त्र: सिद्ध:। अयमेव च त्रि: पठनीय:।


अर्थात् उक्त प्रकार से गायत्री मंत्र के समान तीन तीन चरणों वाले अर्थात् 24 - 24 वर्णों वाले तीन मंत्र सिद्ध होंगे।


दुर्गा सप्तशती की प्राचीन प्रतियों में आचार्य प्रवर पंडित भास्कर राय की गुप्तवती टीका के इस पाठ को स्वीकार किया है। अतः हमें भी इस प्रकार से पाठ करने की वास्तविक विधि पर ध्यानाकर्षण करना चाहिए और लाभार्जन करना चाहिए।


*लोक में प्रचलित परम्परा 20+4+8= 32 वर्णों के इन त्रिपात् मन्त्रों के विभाजन पर प्रश्न खड़ा होना स्वाभाविक है कि यह 20+4+8= 32 का विभाजन किस न्याय से त्रिपात्  स्वरूप है। वैसे यह विशुद्ध परम्परा रही है फिर भी प्रश्न तो उत्पन्न होता ही है।-


बीस अक्षरों का प्रथम भाग -

या देवी सर्वभूतेषु मातृरूपेण संस्थिता नमस्तस्यै।१। 


चार अक्षरों का द्वितीय भाग -

नमस्तस्यै।२।


और आठ अक्षरों का तृतीय भाग -

नमस्तस्यै नमो नमः।३।


इस विषय में महर्षि काण्व ने प्रश्नों की झड़ी लगाकर विद्वज्जनों से पूछा है -


प्रथमो विंशत्यक्षरो द्वितीयश्चतुरक्षर: तृतीयोऽष्टाक्षर इति विभजनं केन न्यायेन केन वा वचनेन सिध्यतीति।।


वास्तव में विद्वज्जनों के लिए चिन्तनीय एवं विचारणीय है।

 

कई बार कुछ परम्पराएं मूल रहस्य के अनुसंधान के बिना ही स्वीकार कर ली जाती हैं। ये  परम्पराएं गुरुमुख या अनुकरण के आधार पर आप्त बन जाती हैं ऐसा मेरा मानना है।


"नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः" पाठ का मूल रहस्य-


प्रचलित परम्परा में प्रायः विद्वज्जन दुर्गा सप्तशती के पंचम अध्याय में  नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः वाक्य में तीन बार प्रयुक्त नमस्तस्यै या  तस्यै पद के तीन बार प्रयोग को आधार मानकर तीन बार नमस्कार को स्वीकार करते हैं। 


वास्तव में तो यहां तस्यै पद की आवृत्ति तीन बार हुई है न कि  नमः की। जबकि नमः की तो पांच बार आवृत्ति हुई है।


यथा-

मातृरूपा हि सात्त्विक राजस तामसतया त्रिधा विद्यत इति तत्परामर्शकं "तस्यै" पदं त्रिरभ्यस्यते।


और कह रहे हैं कि यहां  नमः पद तो प्रसाद अथवा सम्भ्रम अर्थ में है जिसका प्रयोग पांच बार हुआ है। यथा-

नमः पदं तु प्रसादने सम्भ्रमे वा।


और यदि नमः पद को तीन बार प्रयोग देखना चाहेंगे तो प्राचीन ग्रंथों में प्रयुक्त पाठ ही श्रेयस्कर है। यथा-


या देवी सर्वभूतेषु मातृरूपेण संस्थिता नमस्तस्यै नमो नमः।।


यहां नमः का प्रयोग तीन बार हुआ है न कि तस्यै का।


तस्यै या नमः पद के तीन बार प्रयोग में कोई दोष नहीं माना है शास्त्रकारों ने-


विषादे विस्मये हर्षे खेदे दैन्येऽवधारणे।

प्रसादने संभ्रमेऽपि द्विस्त्रिरुक्तं न दुष्यति।।


यदि विषाद में, विस्मय में, हर्ष में, दैन्यभाव में, प्रसाद में, संभ्रम आदि की स्थिति में किसी एक ही बात को दो तीन बार भी बोला जाए तो कोई दोष नहीं होता है।


नमस्तस्यै नमो नमः वाक्य में तीन बार नमः पद के विषय में कहा है -


त्रि: प्रणमने महत्कुलं इति एकस्या: त्रि नमस्कारो यथा त्रिस्रि: प्रदक्षिणमिति अन्य आह।


क्षमा करें पुनः निवेदन करूं कि नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः वाक्य में  तो नमस्कार के रूप में नमः पद का प्रयोग पांच बार हुआ है। 


हां यहां तस्यै पद का प्रयोग तीन बार हुआ है।


ऐसी शंकाएं और प्रश्न प्रतिपादित होना स्वाभाविक ही है। तीन बार नमस्कार को स्वीकार करने वाले महानुभाव  पांच बार प्रयुक्त नमः उपपद पर दृष्टिपात क्यों नहीं करते है? 


पूर्व आचार्यों ने तीन बार नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै के स्थान पर इस प्रकार तीन तीन बार नमः को भी महत्व दिया है-


1. नमस्तस्यै नमो नमः

2. नमस्तस्यै नमो नमः

3. नमस्तस्यै नमो नमः


शुम्भ निशुम्भ से अपमानित - प्रताड़ित शचीपति इन्द्र और देवगण विष्णुमाया जगदम्बा के अपराजिता स्वरूप को स्मरण कर सोचते हैं -


तयास्माकं वरो दत्तो यथाऽऽत्सु स्मृताखिला।

भवतां नाशयिष्यामि तत्क्षणात्परमापद:।।


और उसके बाद देवगण दैन्यभाव से आर्त स्वर में मां भगवती विष्णुमाया की स्तुति करने लगते हैं। और दीन भाव से बारम्बार नमः नमः नमः उच्चारित करते हैं।-


नमस्तस्यै नमो नमः, नमस्तस्यै नमो नमः, नमस्तस्यै नमो नमः।


चतुर्धरी टीका में इस प्रकार से भी अन्वय किया है।-

... तस्यै देव्यै नमो नमः


इस विषय में प्रथमतया ये तो प्रसिद्ध ही है कि मां दुर्गा के सात्विक राजसिक तामसिक स्वरूप को नमस्कार है। 


दूसरा पक्ष मां भगवती के कायिक वाचिक मानसिक स्वरूपों को तीन बार नमस्कार कहा है-


पदत्रयेण कायिकवाचिकमानसिक नमस्कारत्रयं दर्शितम्।


तीसरा पक्ष ऋग्वेद यजुर्वेद सामवेद की तीन शक्तियों को नमन है। 


चौथा पक्ष गायत्र्यादि तीन छंदों को नमस्कार है। 


पांचवां पक्ष महाकाली महालक्ष्मी महासरस्वती स्वरूपिणी त्रिगुणात्मक जगज्जननी मां दुर्गा को बारम्बार प्रणाम है आदि।


छठा पक्ष सभी प्राणियों में व्याप्त कालत्रयात्मिका शक्ति को बारम्बार प्रणाम है।


सातवां पक्ष भक्ति श्रद्धा और द्योतन (प्रकाश, प्रत्यक्ष, दर्शन) स्वरूपा शक्ति को बारम्बार प्रणाम है। आदि व्याख्याएं शास्त्रों में वर्णित है।


प्रायः सभी शास्त्रकारों ने तीन तीन बार नमस्कार को महत्व दिया है न कि तस्यै पद को।


जो भी हो जब तीन महाशक्तियों की स्तुति आराधना का आर्त स्वर में प्रसंग चल रहा हो, पाठ चल रहो हो वहां एक स्वरुप को बीस अक्षरों से प्रार्थना करेंगे रिझाएंगे और दूसरे स्वरुप को केवल चार अक्षरों से अपेक्षित भाव से निवेदन करेंगे और तीसरे स्वरूप को फिर आठ अक्षरों से नमन करेंगे तो शंका तो व्याप्त होंगी ही।


परम्परा में हम 20+4+8=32 विभाग वाला पाठ कर रहे हैं। इस पाठ पर पूर्वाचार्यों ने और विद्वज्जनों ने जो शंकाएं या आक्षेप किए हैं उन का रहस्य चिन्तनीय है।


इस पर हमें चिन्तन मनन करना ही चाहिए।


ॐ नमश्चण्डिकायै

ॐ नमश्चण्डिकायै

ॐ नमश्चण्डिकायै


             पंडित कौशल दत्त शर्मा

             सेवानिवृत्त प्राचार्य- संस्कृत शिक्षा 

             नीमकाथाना राजस्थान 

             9414467988

            🌹🙏🏻🌹🌹🙏🏻🌹

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