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मातृ नवमी अर्थात् माता दादी पड़दादी का नवमी को श्राद्ध का रहस्य -पं. कौशल दत्त शर्मा, ज्योतिषाचार्य



आजकल मातृनवमी आदि श्राद्ध के विषय में ऋषियों के मूल वचनों को न‌ समझ कर गूगलगुरु एआई आदि के माध्यम से समाज में भ्रान्तियां फैलाई जा रही हैं। इन सब वचनों का मूल समझना होगा उसके बाद ही हमें निर्णय देने चाहिएं।


मातृ नवमी को मातृ पक्षादिक का श्राद्ध केवल अग्निहोत्री अर्थात् साग्निकों को करणीय है न कि सामान्य जन के लिए।


अष्टका अन्वष्टकाश्राद्ध अग्निहोत्रियों के लिए हैं न कि सामान्य लोगों के लिए।

महालयों में मृत्यु तिथि या दाह तिथि को ही श्राद्ध निकालने का विधान है। अमावस्या सर्वपितृ श्राद्ध है।


श्राद्ध की अनेकों विधियां हैं और अनेकों ग्रन्थों में श्राद्ध करने के अनेकों पक्ष विद्यमान हैं। सामान्यत: वर्ष में 96 श्राद्ध कहें हैं ‌जिनमें कन्यागत श्राद्ध मुख्य पक्ष है।-


श्राद्धविधौ बहुग्रन्थेषु बहव: पक्षा:।


महालय श्राद्ध साङ्कल्पिक विधि से अथवा पार्वण विधि से करना चाहिए।-


महालयश्राद्धं सांकल्पविधिना पार्वणविधिना वा कार्यम्।


श्राद्ध के पितरों का स्वरूप-


श्राद्धं त्रिदैवतं षडदैवतं नवदैवतं द्वादशदैवतं वा गृह्याग्नौ यथोक्त विधिना कार्यम्।


मातृ नवमी अर्थात् अन्वष्टका श्राद्ध नवदैवत्य करने के भी आदेश हैं। पितृ मातृ मातामहादि क्रम में।

अन्वष्टका श्राद्ध में मातृ पक्ष का श्राद्ध पृथक् करने के आदेश हैं।


अत्र मातु: पृथक् श्राद्धमन्यत्र पतिना सह।।


मातृनवमी श्राद्ध अन्वष्टका श्राद्ध कहलाता है। प्रथमत: अष्टका-अन्वष्टका को समझना होगा।-


अन्वष्टका- अष्टौ परिमाणानि अस्याः। अष्टकाम् अनुगता।


अष्टका श्राद्ध कृष्ण पक्ष की अष्टमी को और अन्वष्टका श्राद्ध कृष्ण पक्ष की नवमी को करणीय हैं, जो केवल साग्निकों के लिए करणीय है न कि हम निरग्निकों के लिए। 


पौष माघ फाल्गुन और आश्विन मास की अष्टमी अष्टका कहलाती हैं उनके पश्चात् वाली तिथि अर्थात् कृष्ण पक्ष की नवमी अन्वष्टका कहलाती है।-


सा तु गौणचान्द्रपौषमाघफाल्गुनाश्विनमासानां कृष्णनवमी। तत्र साग्नीनां मातृकश्राद्धम्। तत्र साग्निकर्त्तव्यमातृपक्षश्राद्धम्।


श्राद्धविवेक में कहा गया है कि मातृनवमी के दिन माता दादी पड़दादी का श्राद्ध साग्निकों को करणीय है अन्य को मुख्य तिथि में ही करना चाहिए। महर्षि शङ्ख ने भी कहा है -


पित्रादित्रिकपत्नीषु भोज्या मातॄः प्रतिद्विजाः।

स्त्रीणामेव तु तद्यस्मान् मातृश्राद्धमिहोच्यते॥  


मातृनवमी श्राद्ध अन्वष्टकाश्राद्ध कहलाता है जो साग्नीक मात्र के लिए कर्त्तव्य है। ऐसा विष्णस्मृति में  आदेश है
-


अन्वष्टकास्वष्टकावदग्नौ हुत्वा मात्रे पितामह्यै प्रपितामह्यै पूर्ब्बवद्ब्राह्मणान् भोजयित्वा।

अत्र होमत्वादेवाग्निप्राप्तेरग्निग्रहणं तन्नियमार्थं। न चाग्नौ करणहोमे विप्रपाण्यादेर्व्विधानादत्रापि तथेति वाच्यम्।

प्रकृतीभूतश्राद्धविध्युक्तस्याधारान्तरस्य विकृतीभूतश्राद्धे विशेषविहिताधारेण बाधात्। शरमयवर्हिषा कुशमयवर्हिर्बाधवत्। न वा लौकिकाग्नौ होमः।


यह सब हम लौकिकों के लिए नहीं हैं।


महर्षि मनु ने भी मातृ श्राद्ध अन्वष्टकाश्राद्ध अर्थात् सधवा मातृ श्राद्ध का हम लौकिकों के लिए निषिद्ध कहा है।-


न पैत्रयज्ञियो होमो लौकिकाग्नौ विधीयते।


अष्टका श्राद्ध -


गौणचान्द्रपौषमाघफाल्गुनमासीयकृष्णाष्टमी। आश्विनकृष्णाष्टमी च‌। तत्र साग्नीकानां श्राद्धम्।


साग्निकों को सधवा माता के श्राद्ध के साथ मातृपक्ष का श्राद्ध षडदैवत विधि से मातृ नवमी को करना चाहिए ऐसा शास्त्रीय आदेश है। परन्तु राजस्थानीय परम्परा में और लोकाचार में ऐसा नहीं देखा जाता है। गृहाग्नि रहितों के लिए ये आवश्यक नहीं है।


साग्निकों की गणना भी न्यून है अतः इसका भी लोप प्रायः है।


मातृ नवमी को अविधवानवमी सधवानवमी सौभाग्यनवमी और मातृ श्राद्ध तिथि भी कहा जाता है।


महालयों में जिन भी मातृ-पितृ पक्ष की मृत्यु तिथि नवमी है उनका श्राद्ध तो नवमी को ही करने के आदेश हैं।


उसी प्रकार जिनका चतुर्दशी या अन्य निषेध तिथ्यादि को मृताह/दाहाह है उनका श्राद्ध तो मृत्युतिथि को ही करना चाहिए। उसी तिथि को श्राद्ध करने में कोई दोष भी नहीं है। कतिपय विद्वज्जन द्वादशी या अमावस्या को लिखते हैं।


वैसे श्राद्ध में योग्य ब्राह्मण को भोजन कराने का ही आदेश है। राजस्थानीय समाज के साथ ही कई क्षेत्रों में स्त्री के श्राद्ध में स्त्री को ही भोजन कराने की परम्परा है जब परम्परा है तो कोई न कोई ऋषि वचन का पालन ही हो सकता है। अतः स्त्री को भोजन कराने में कोई दोष नहीं मानना चाहिए। अब कोई निषेध कहता तो कहने दें।-


          श्राद्धादौ सुवासिनीभोजनमपि कार्यम्।


शास्त्र कहते हैं सपिण्डन (पितृमेलापक) तक या ऊनवार्षिक श्राद्ध पूर्व अर्थात् साढ़े ग्यारह महिने तक परिवार में आने वाले किसी भी परिजन के श्राद्धादिक को नहीं करना चाहिए। शास्त्र तो दैवकार्य और पितृकार्य दोनों के लिए निषेध करते हैं। कोई कहता है कि किसी का श्राद्ध न छोड़ें कर सकते हैं तो कहने दें।-


         न दैवं नापि वा पित्र्यं यावत्पूर्णो न वत्सर:।


सपिण्डन के बाद पित्रादिकों का पार्वण पद्वति से ही श्राद्ध करें और मात्रादिकों का एकोद्दिष्ट विधि से श्राद्ध करें। जबकि मरुप्रदेश में सभी मृतकों की श्राद्धतिथि में पार्वण विधि से न श्राद्ध होते हैं न ही ब्राह्मण भोजन। श्राद्ध किसी का हो एकविप्रभोजन की परम्परा है और कहीं न कहीं शास्त्रीय भी है।


हेमाद्रि का वचन -


सपिण्डीकरणादूर्ध्वं पित्रोरेव हि पार्वणम्

पितृव्य-भ्रातृ-मातॄणामेकोद्दीष्टं सदैव हि।।


मातृ नवमी अर्थात् माता आदि का अन्वष्टकाश्राद्ध समय-


पूर्वाह्ने मातृकं श्राद्धमपराह्ने तु पैत्रिकम्।

एकोदिष्टं तु मध्याह्ने प्रातर्वृद्धि निमित्तकम्।।


श्राद्धों में समय व्यवस्था भिन्न भिन्न हैं।


इसका सरलीकरण करते हुए लिखा है कि श्राद्ध करना है पितरों की प्रसन्नता के लिए करें तो सही-


भारते पितर: पूज्या यथाकालं यथाविधि।

प्रयच्छन्ति शुभानर्थानानृण्यं च प्रजायते।।


और भ्रान्ति बनी है कि स्वयं कर्ता या ब्राह्मण के तिलक करना चाहिए। न स्वयं करें न श्राद्ध करने वाले के मस्तक पर तिलक लगाएं। देखिए शास्त्र क्या कहता है-


ललाटे पुण्ड्रकं दृष्ट्वा स्कन्धे माल्यं तथैव च।

निराशा: पितरो यान्ति शापं द्वारा सुदारुणम्।।


वैसे लोकाचार में तिलक लगाते देखा जा सकता है। चर्चित भाल, गले में माला-मणियां, सुगन्धित पदार्थादि देखकर पितर पीड़ित होकर लौट जाते हैं ऐसा शास्त्रों में लिखा है।


इसी प्रकार चतुर्दशी श्राद्ध के लिए भी भ्रान्ति बनी हुई है कि इस दिन केवल शस्त्रादिना हत श्राद्ध करें। जिसकी भी मृत्यु तिथि जिस दिन है उस दिन श्राद्ध का विशेष महत्व है। कतिपय विद्वज्जन इससे सहमत नहीं हैं।


ये सब सकृत्महालय के अंग हैं समझना होगा इन्हें। जिनकी जो मृत्युतिथि है उसके लिए महालयों में वही तिथि ग्रहण करने का प्रयास करें। अमावास्या तो सर्वग्राही है ही।


या तिथिर्यस्य मासस्य मृताहे तु प्रवर्तते।

सा तिथि: प्रेतपक्षस्य पूजनीया प्रयत्नतः।।


महालयों में भरणी श्राद्ध, अन्वष्टका श्राद्ध, मघा श्राद्ध, सांकल्पिकविधि श्राद्ध, असांकल्पिकविधि श्राद्ध, गजच्छाया श्राद्ध, शस्त्रादिहते चतुर्दशी श्राद्ध, अश्रुमुखश्राद्ध, नान्दीमुखश्राद्ध और दौहित्रप्रतिपच्छ्राद्ध आदि कहे गये हैं। तिथिवारनक्षत्रादिक निषेध किये हैं। वे सब विशेष वचन हैं। जो हम सबके लिए ग्राह्य नहीं हैं। इनके मूल को समझने की आवश्यकता है।


यदि फिर भी कोई शंका शेष रहे तो इन पर भी गम्भीरता पूर्वक शास्त्रीय चर्चा होनी ही चाहिए।


उपर्युक्त ये सब श्राद्ध यदि करें तो अविधवानवमी अर्थात् षडदैवत्य मातृनवमी की तरह करणीय हैं जो केवल साग्निकों के लिए हो सकते हैं निरग्निकों के लिए नही। इनमें से कुछेक को ही हम लोग जानते हैं पर मानते नहीं। न ही लोक परम्परा में हैं। क्यों नहीं है इन श्राद्धों की मान्यता? इसके लिए ग्रन्थ तो देखने ही होंगे।


क्षमा करें शास्त्रीय पक्ष की पुष्टि के लिए शास्त्र वचन ही प्रमाण हैं न कि कोई वैज्ञानिक पक्ष या किसी की व्यक्तिगत उपज।


इस नवमी को सौभाग्यवती मां का श्राद्ध कहा है वह अन्वष्टकाश्राद्ध का ही तो अंग है। कोई कहते हैं पिता के मरने के बाद भी साग्निक नवमी को ही सौभाग्यवती मां का श्राद्ध करें। नहीं। इसे समझना होगा।


और भी बहुत से पक्ष और प्रश्न है जो बुद्धिजीवियों को भ्रमित करते हैं। और हम उन जिज्ञासाओं के तत्काल प्रत्युत्तर देकर जिज्ञासाओं की तत्काल ही इतिश्री करना चाहते हैं। सर्वप्रथम हमें शास्त्रीय पक्ष पर चिन्तन करना चाहिए।


हां आजकल हमारे क्षेत्र में एक बिमारी और चल रही है कि सौभाग्यवती स्त्रियों का सपिण्डीकरण तेरहवें दिन कराने लगे हैं। जो शास्त्र विरुद्ध है। सपिण्डीकरण "द्वादशाह" के दिन ही करवाया जाना शास्त्रीय है। चाहे स्त्री हो या पुरुष।

सादर वन्दे!!


            पं. कौशल दत्त शर्मा, ज्योतिषाचार्य 

            नीम का थाना राजस्थान

            9414467988

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लेखक: [डॉ कौशल दत्त शर्मा ,सेवानिवृत्त प्राचार्य- संस्कृत शिक्षा]


लेखक की अनुमति से प्रकाशित


यह लेख [डॉ कौशल दत्त शर्मा ,सेवानिवृत्त प्राचार्य- संस्कृत शिक्षा] द्वारा लिखा गया है और उनकी अनुमति से HINDU ASTHA वेबसाइट पर प्रकाशित किया गया है। इस लेख की मूल सामग्री पर लेखक के अधिकार सुरक्षित हैं। बिना लेखक की अनुमति के इस सामग्री को पूर्ण या आंशिक रूप से कॉपी, पुनर्प्रकाशित या अन्यत्र प्रकाशित न करें।


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